कैसे भुलाऊँ / डॉ सुलक्षणा

कैसे भुलाऊँ मैं उन काली यादों को,
दिल के कहे अनकहे जज्बातों को।

तुमने तो वो खिलौना समझा मुझे,
जो दिल बहलाए तुम्हारा रातों को।

कसूर तुम्हारा नहीं है, कसूर मेरा है,
जो प्यार समझ बैठी मीठी बातों को।

तुम्हें तो चाह थी मेरा जिस्म पाने की,
इसीलिए तड़पते थे तुम मुलाकातों को।

भूल कर सब कुछ मैं समा गई बाहों में,
मैं नादाँ जान सकी ना तुम्हारे इरादों को।

जैसी ही सीधी हुई बिस्तर की सिलवटें,
तुम भूल गए किये हुए कसमें वादों को।

जब पूरी हो गयी अधूरी चाहत तुम्हारी,
तुम चल दिये मुझसे दूर छुड़ा हाथों को।

“सुलक्षणा” खड़ी चौराहे पर सोचती रही,
कैसे बंद करे वो मोहब्बत के खातों को।

©® डॉ सुलक्षणा

क्या कहूँ आज और क्या नहीं समझ नहीं पा रही हूँ मैं,
गिरगिट सी रंग बदलती दुनिया को देखे जा रही हूँ मैं।

पुरुष के गले के नीचे नहीं उतर रहा ये बदला मिजाज,
उसे आज भी अपने पाँव की जूती नजर आ रही हूँ मैं।

नारी के बिना सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती,
पर अहम के नीचे दबे पुरुष के लिए अबला रही हूँ मैं।

साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पलने में झुलाया है मैंने,
आज भी अपने धर्म पर रहते हुए फर्ज निभा रही हूँ मैं।

सूर्य के रथ को रोका है मैंने, यमराज को विवश किया है,
फिर भी युगों युगों से नम्रता पूर्वक सिर झुका रही हूँ मैं।

सदा ही शालीनता, सहनशीलता का परिचय दिया मैंने,
सदियों से ही आँसुओं को पी कर गम को खा रही हूँ मैं।

हर रूप में पुरुष का साथ दिया मैंने और धोखा खाया,
पर धोखा खाकर भी कदम से कदम मिला रही हूँ मैं।

नश्तर सी चुभेंगी ये बातें सभी झूठे अभिमानियों को,
इसीलिए सुलक्षणा पर कड़वा सच लिखा रही हूँ मैं।

©® सर्वाधिकार डॉ सुलक्षणा अहलावत के पास सुरक्षित हैं।

काव्य महक में आज की खूबसूरत रचनाएँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *