नसीब देखा

कुछ लोंगों को दिल से बहुत ग़रीब देखा।
आस-पास और अपने बहुत क़रीब देखा ।।

धन ज्ञान का दर्प अहं का है ग़र्क भी देखा।
पर हाव भाव ब्यवहार बहुत अजीब देख।।

दीन दौलत का तरस पल दिन बरस देखा।
पर ख़ुशियाँ तो उनके , ही नसीब देखा।।

महल फ़्लैट में तनहा मरते , फ्लैट देखा।
ऐसा बहुतों को है बदनसीब देखा।।

जो कंधों पर शांति सुकून संदेश ले आया।
उसी के कंधों पर खुद का सलीब देखा।।

पंडित अनिल

बता दे तूँ हीं

सुकून ढूँढ़े कहाँ चल बता दे तूँ हीं।
तुझको प्यार है कि नहीं चल बता दे तूँ हीं।।

कह तो ला दूँ रेगिस्ताँ में झरने।
तुझे ऐतबार है कि नहीं चल बता दे तूँ हीं।।

ओस के जैसा वज़ूद है अपना।
तुझको क़रार है कि नहीं चल बता दे तूँ हीं।।

तोड़ दे चुप्पी हटे ये खामोशी।
दिल बहार है कि नहीं चल बता दे तूँ हीं।।

हम तो परवाने यूँ ही जल जायें।
तेरा इजहार है कि नहीं चल बता दे तूँ हीं।।

मिलना यूँ रोज़ इत्तफ़ाक़ अनिल।
ये इंतज़ार है कि नहीं चल बता दे तूँ हीं।।

पंडित अनिल

कटार उठाओ

फेंक दो चूड़ी कंगन कर कटार उठाओ।
बस्त्र संभालो स्वयं स्वयं की लाज बचाओ।।
जाल फेंकते नर से धोखे मत खाओ।
तोड़ दो इनके गर्व पे तांडव कर जाओ।।

जिसकी आँखों मे रिश्तों का मान नहीं।
बहन बेटियों का करता सम्मान नहीं।।
ऐसे दानव दुष्टो का शोणित पी जाओ।
फेंक दो • • • • • •

माँ के आँचल को ये लज्जित हैं करते।
कैसे अपने घर में पग हैं ये धरते।।
रूप कालिका धर रणचंडी बन जाओ।
फेंक दो • • • •

औलादें इनकी इनसे क्या पायेंगी।
कैसे भरे समाज में आँख मिलायेंगीं।।
ऐसे धुर्तो के बहकावे मत आओ।
फेंक दो • • • • • • •

पंडित अनिल

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