जब तक दिलों में तूफाँ/ सलिल सरोज

जब तक दिलों में तूफाँ

जब तक दिलों में तूफाँ, लबों पे गुमाँ होंगे
तक तक बगैर नींव ही रिश्तों के मकाँ होंगे
हिज़रत रोज़ों से ही कब तलक जवाँ होंगे
बच्चों के सजदे से ही रास्ते जब आसां होंगे
घरों में रिश्ते कम अब ज्यादा सामां होंगे
हम अपनी ही जड़ों से जब तक परेशां होंगे
ये ग़ुरबत, ये तंगदिली सरेशाम पशेमाँ होंगे
जब भीड़ की जद में मासूमों के गिरेबाँ होंगे
हर तारीख़, हर दौर में बेधड़क गुनाह होंगे
जब तलक़ जम्हूरियत में सिले हुए ज़ुबाँ होंगे
इन दौलत,इन मिल्कियत के क्या शमाँ होंगे
जब सब यूँ ही छोड़ हम दुनिया से फना होंगे
जब तक तुम्हारी निगाहों में शर्म बयाँ होंगे
क्या पता हम किस मुल्क, किस जहाँ होंगे।।

सलिल सरोज

क्या क्या जतन न किये/संजीव सुधांशु

मैं तेरे लिये बस जिया करुँ/सुरेश भरद्वाज निराश

काव्य महक में आज की खूबसूरत रचनाएँ


ऑनलाइन ई पत्रिका भारत का खजाना में पेश है काव्य महक की खूबसूरत रचनाएँ। आज के रचनाकार हैं
श्री रमेश चन्द्र मस्ताना जी
डॉ सुलक्षणा जी
श्री राजेश पुरोहित जी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *