दरिंदों को नहीं छोड़ेंंगे-संकल्प

बहन बेट्टियों की इज्जत तार तार 
करने वाले दरिंदों !
तुम खुद ही शर्म से मर क्यूं नहीं जाते
एसे घिनौने कृत्यों को अंजाम देकर
क्यूँ उस कानूनी रस्सी का
इन्तज़ार करते हो
जो तुम्हारे गले में पड़े न पड़े 
और जाने कब पड़े
तुम खु़दा को नहीं मानते
कानून को नहीं मानते
बहन बेट्टियों का दर्द नहीं समझते
तुमने सारे पुरुष वर्ग को 
महिलाओं की नज़र में 
अपराधी बना दिया है
तुम्हारे गुनाहों की सजा 
अब हम नहीं झेलेंगे
जड़ मूल से तुम्हारा सर्वनाश कर देंगे
माँ के पेट से जन्म लेकर भी तुम
औरत को माँ नहीं मानते
धिक्कार है तुम पर 
तुम्हारी नपुंसक मर्दानगी पर
हव्स के रेंगते कीड़ों !
तुम बहन बेट्टियों पर नहीं
देश की अस्मिता पर बार करते ह़ो
मानसिक रोगी  हो तुम
दुश्मन हो तुम मानवता के
तुम सोचते हो तुम्हारा क्या बिगड़ेगा
अरे तुम उन आँसुओं में 
जो तुमने बहन बेट्टियों को दिये हैं
समाज को दिये है, देश को दिये हैं
स्वयं ही झुलस जाओगे
तुम्हारी माँएं
तुम जैसे दरिंदों को पाल कर
किसी को मुँह नहीं दिखा सकतीं
तुम्हारी अपनी बहनें 
घर से बाहर नहीं निकल सकतीं
तुम्हारे बाप 
पश्चाताप के आँसू रोने को बाध्य हैं
समाज तुमसे परेशान है
तुमसे बदला चाहता है
अब तुम्हें जीने का कोई अधिकार नहीं
घिन्न आती है हमें तुमसे, हम सबको
नहीं देखना चाहता ये देश तुम्हें
जरूरी है तुम बिना देर किये 
खुद ही शर्म से मर जाओ

सुरेश भारद्वाज निराश

धर्मशाला