गजल
क्या क्या जतन न किये मेरे गिराने की खातिर,
वो गिरते ही चले गए खुद को उठाने की खातिर |
नयी राहें नये पडाव ही मंजिल तक पहुंचायेंगे,
पिछड़ जाते हैं जो बदलते नहीं पुराने की खातिर |
वो हमें सपने दिखा रहे हैं चांद के मंगल के,
दिखते नहीं नौनिहाल तडफते खाने की खातिर |मज़हब,जातियां,दंगे,बंद,भ्रष्टाचार न जाने क्या क्या,
होड मची है शैतानों में मां भारती को रूलाने की खातिर |
समां भी है, रिंदों की महफ़िल और दस्तूर भी है,
मयकदे के दर खोल साकिया ला पैमाने पिलाने की खातिर |
किसान भूखा, बुनकर नंगा, मजदूर लाचार है,
हर मजलूम कतार में खड़ा है मेहनताने की खातिर |
कौन कहता है कि जमाने से वफा खत्म हो गई है,
बहुतों को देखा है मिटते हुये याराने की खातिर |
हर किसी के नसीब में विसाले यार कहां सुधांशु,
तमाम रात जलती रही शमा परवाने की खातिर |
संजीव कुमार सुधांशु
गांव व डा. च्वाई त. आनी जिला कुल्लू (हि. प्र.)
7018833244

काव्य महक में आज की खूबसूरत रचनाएँ


ऑनलाइन ई पत्रिका भारत का खजाना में पेश है काव्य महक की खूबसूरत रचनाएँ। आज के रचनाकार हैं
श्री रमेश चन्द्र मस्ताना जी
डॉ सुलक्षणा जी
श्री राजेश पुरोहित जी।