—-सच्चा तीर्थ——
सच्चा है एक तीर्थ वो,
सबने वहाँ ही जाना है।
मिटना है वजूद सबका
लौट किसी ने न आना है।

कई तीर्थ घूमें मैंने,
यथार्थ ज्ञान न आया है
जब- जब भी इस तीर्थ गया,
बिना सीख ज्ञान पाया है।

जब तक लिखे स्वास ईश ने
तब तक ही यहाँ रहना है।
उड़ना फिर शाश्वत पंछी,
चोला छोड़ यह जाना है।

छोड़ जानी जोड़ी पूँजी,
दिल लगा के जो जोड़ी है।
सारी उम्र कमाए बंदा
फिर भी सोचे थोड़ी है।

मैं-मेरी कर गुजरे उम्र,
पर है यहाँ क्या तेरा है।
छोड़ यह गरूर ही सारे
यह तो काल का फेरा है।

निश्छल जो कर्म है करने,
वो नित्य साथ निभाते है।
निकृष्ट कर्म कष्टकर सभी
जो कभी काम न आते है।

नेकी के सब काम करना।
वक्त मिला नहीं खोना है।
सारी पूँजी छोड़ जानी,
फिर “विक्रम”नहीं रोना है।

विक्रम
समोट चम्बा