वहशीपन

धमनियों में मेरी
अब भी खौलता है
वो कतरा खून का
जो जम गया था कभी
देख कर तेरा क्रूर चेहरा
अपनी आँखों के सामने
और तुमने झकझोर दिया था
मेरी अन्तर्आत्मा को
अपने वहशीपन से
हैवानियत का वो नंगा नाच
जो तूने खेला था
भूल नहीं पायेंगी
कभी भी यह सदियाँ
और माफ नहीं करेंगी
तुम्हें, तुम्हारे बजूद को
तुम्हारे कृत्य को
तुम्हारी सोच को।

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हिप्र