रोएँगे , चीखेंगे , बहुत चिल्लाएँगे
जिस दिन बाज़ार में बिक जाएँगे

कौड़ी के भाव बिक जाएँगे आँसू
फिर भी खरीददार कहाँ से लाएँगे

ज़िंदगी,मौत,जन्नत,दोज़ख सब हैं
बिना दाम के पहचान नहीं पाएँगे

धर्म, कानून, समाज सबके ठेले हैं
तय करें किसकी डुगडुगी बजाएँगे

शिक्षा,दीक्षा,परीक्षा सेल में लगे हैं
मिलिए फुरसत में तो मिलवाएँगे

आत्मा परमात्मा तराज़ू पे झूल रहे
मोल भाव हो तभी डंडी हिलाएँगे

पैसे से हर चीज़ नहीं खरीदी जाती
पर आप किस किस को समझाएँगे

सलिल सरोज

झूठ कहने के तरीके हज़ार हैं
साहेब आपके सलीके हज़ार हैं

अखबार,व्यापार,सरकार,सरोकार
आज सब नंगे खड़े भरे बाज़ार हैं

मान गए आप आला खलीफा हैं
बेच दिए यूँ ही नहीं मंदिर मज़ार हैं

हर कही बात हो ,जरूरी तो नहीं
पर आँखों से रोते तो जाऱ जाऱ हैं

वक़्त पूछेगा क्यों आप बेज़ार हैं
अतीत की नब्ज काटती औज़ार हैं

सलिल सरोज

इंसानियत की बात मत पूछ लेना
कभी पानी की जात मत पूछ लेना

चमक रहे हो तो बहुत ही अच्छा है
पर सूरज की औकात मत पूछ लेना

बयानों से कुछ काबू में नहीं आएगा
फुटपाथ पे कटी रात मत पूछ लेना

फँस ही जाओगे अनजान भँवर में
ज़ुल्म की शुरुआत मत पूछ लेना

नहीं सुन पाओगे दो पल भी तुम
गरीबों के जज़्बात मत पूछ लेना

हँसी से कहीं मर ही ना जाओ तुम
आज़ादी की सौगात मत पूछ लेना

सलिल सरोज