पुरुषार्थ
——–
मैं पाषाण युग पुरुष हूँ,,
हाँ मैं आदि मानव ही हूँ।।
जिसने जिस्म सिर्फ
भोग वस्तु माना,,
न कोई माँ की परिभाषा
न कोई बहन का अस्तित्व,,
था तो सिर्फ जिस्म
एक भरा पूरा जिस्म,,
हम तब टूट पड़ते थे उसपर,,
बिलकुल आज की तरह,,
कोई मर्यादित सीमा नही था
न तब और न अब।।
बचाकर रखो खुद को
बचा सकती हो तो,,
मैं खुला घूम रहा हूँ
नर पिशाच बना,,
हर ओर हर छोर तक,,
बस चाहिए मुझे एक जिस्म
जिसे इक्कीसवीं सदी में भी
पाषाण कालीन सा
पुरुषार्थ झेलना है।।

आवेग जायसवाल
958 मुठ्ठीगंज
इलाहाबाद
9415960293