सखी भाव- 1

भाव
क्यूँ खाती हो भाव सखि री
फूटे मेरे भाग सखि री
कैसे जाऊँ नदिया पारे
टूटी मेरी नाव सखि री

उसने मेरा सब कुछ छीना
दे गया गहरा घाव सखि री
उछल उछल कर लहरें नाचें
गहरा नीला आव सखि री

ज़ालिम ने है सुध बुद्ध छीनी
मिट गया मेरा चाव सखि री
शमशानों की धूल लगा कर
सींचा मैंने सुहाग सखि री

सांप क्या जाने चन्दन महिमा
अपना अपना सुभाव सखि री
मैंने सबका दिल बहलाया
सबने खाया ताव सखि री

टप टप आँसु आँख बहाये
रिस्ते मेरे घाव सखि री
मिल न पाई मैं साजन से
जलूँ विरह की आग सखि री

दिल जले और आँखें भीगें
यह कैसा अनुराग सखि री
उसकी खातिर सब कुछ छोड़ा
उल्टा पड़ गया दाव सखि री

दिल धड़के और आँख फड़के
छज्जे पर है काव सखि री
निराश मेरा वो बन जाये
धुंधला धुंधला खाव सखि री

सखि भाव …2
मार
कर्मों की है मार सखि री
डूव गया घर वार सखि री
गहरी गहरी साँस चली है
धीमी सी रफतार सखि री

और भी मुझको जीना है
मानूं कैसे हार सखि री
सब कुछ मेरा उजड़ गया है
काहे का घर द्वार सखि री

वो भी मेरा हुआ न अपना
कहते जिसको प्यार सखि री
मेरी कश्ती वहीं पे डूबी
जहां नहीं मझधार सखि री

कोई अपना नहीं यहां पर
जीवन का यह सार सखि री
मांगे से तो यार मिले न
वक्त है तीखी धार सखी री

मिलने आया कभी न जालिम
करती रही श्रृंगार सखि री
वा की खातिर खुद न संम्भली
मुझको है धिक्कार सखि री

रास न आई उसको चाहत
बिकी सरे बाज़ार सखि री
हर किसी ने मुझको घूरा
हो गयी मैं इश्तहार सखि री

टूट गयी हूँ थक गयी हूँ
कहां करुँ पुकार सखि री
उसका भाणा मीठा लागे
होगा बेड़ा पार सखि री

उसके दर पे शीश नवाऊँ
वो मेरा भरतार सखि री
दर दर भटकुं ठोकर खाऊँ
भली करे करतार सखि री

प्यार की खातिर प्यार बांटू
होकर में लाचार सखि री
काहे उसकी हुई दिवानी
मिले नहीं दीदार सखि री

सूनी गलियाँ सूना दिल है
सूना सा घर वार सखि री
किसके आगे रोऊँ दुखड़ा
जीवन है बेज़ार सखि री

जिसको चाहुँ उसे मनाऊँ
उसे नहीं इकरार सखि री
बात सुने न माने बात
होठों पर इनकार सखि री

झूठी चाहत झूठे लोग
झूठा यह संसार सखि री
निराश कहूँ मैं किसको अपना
कोई न अपना यार सखि री

सखी भाव-3
हालात
मुश्किल हैं हालात सखि री
लुट गये जज्वात सखि री
झूठे रिश्ते नाते सारे
लगा के मारे घात सखि री

रो रो कर दिल बहलाऊँ
भूल गया कयूँ तात सखि री
दिल का लुटना कभी रुके न
रात हो या प्रात सखि री।

ये दुनियाँ अपने मतलव की
देती रहे आघात सखि री
सर्द ऋतु दुखी है करती
रुलाये बड़ी बरसात सखि री

पाल पोस कर बड़ा किया था
पिता रहे न मात सखि री
अपनों संग सब सुखी हैं
मैं अकेली जात सखि री

न कोई है बहना अपनी
न है कोई भ्रात सखि री
नज़र नज़र में दिल चुराए
लूटे अस्मत बलात सखि री

सर पे जिसके हाथ आ मेरे
वो कर गया अनाथ सखि री
कब तक उखड़ी साँस चलेगी
हो अब कैसे ज्ञात सखि री

सूना सूना दिन है मेरा
सूनी सूनी रात सखि री
हर साँस में उसे पुकारुँ
हो कैसे मुलाकात सखि री

दुश्मन हो गये सारे आपने
दुश्मन हुए अज्ञात सखि री
दिल टूटा पर जाँ न निकली
ये उसकी करामात सखि री

कोई मुझको मुँह न लगाए
कोई करे न बात सखि री
उजड़ी उजड़ी दुनियाँ मेरी
उजड़े से ख्यालात सखि री

मुश्किल से घर था बसाया
तोड़ गये हालात सखि री
घर से निकलूँ बाहर जाऊँ
निराश कहे बदजात सखि री्

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हि प्र
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