सवक

बिन कहे कई आज अफसाने बन गये
कही बातें कुछ हमारी ताने बन गये
किसकी सोच से किसके ख्याल बन गये
पूछा जब तो अपने ही बैगाने बन गये ।।

मल्कियत की खवर न खेत वन्जर बन गये
रोकी राहें मकान श्यामलात पर बन गये
शमशान घाटों की जमीन पर हुई घेराबन्दी
जब पंचायत प्रधान हिमायतदार बन गये।।

रुके नशा और थमे दुर्घटनाएं का दौर
मानवता के कातिल खार ड़गर बन गये
जनहित के कामों से टूटने लगी कमर
दुश्मन विकास के मामे शुकनी बन गये।।

गुजरते हैं जहाँ से हर रोज बे लोग
राह रोक राहु के गुनाहगार बन गये
सबक सिखाना आज हुआ है जरुरी
मनरेगा लूट से जो सर्मायेदार बन गये।।

रोज सज रहे है मेले खेल प्रेमियों से देखो
पत्थरों पर मैदान खेल आलिशान बन गये
दौडे जो यहाँ देखो सेना के जवान बन गये
गांव आज शहर में जग्गू पहचान बन गये।।

जग्गू नौरिया।।

खज्जियार यूँ ही नही कहलाता “मिन्नी स्विट्जरलैंड”

गैरों से दिल लगाना/सुरेश भारद्वाज निराश