मेरी योनि से निकल कर/ डॉ सुलक्षणा

मेरी योनि से निकलकर,
मेरी छाती का दूध पीकर,
तू अपने पैरों पर हुआ खड़ा।

मेरी ही बहन, बेटी की,
देख ऐसी ही योनि और छाती को,
रौंदने को तू कैसे उस पर चढ़ा।

भूल गया कैसे तू,
मेरे गर्भ में रखने का कर्ज,
जो मेरा दूध सरेआम लज्जाने चला।

माँ हूँ मैं पर एक औरत हूँ भी,
तेरी बहन भी एक औरत है,
भूलकर ये क्यों गलत कदम उठाने चला।

मुझ पर भी किसी की नीयत डोलेगी,
तेरी बहन भी किसी को पसंद आएगी,
क्या होगा जब कोई हमें भी ऐसे ही नौच डालेगा।

हम भी रोयेंगी, गिड़गिड़ाएंगी,
इज्जत बचाने को गुहार लगाएंगी,
क्या होगा हवस पूरी करने की वो भी सोच डालेगा।

सीना छलनी हो गया मेरा आज,
काश धरती फट जाए और मैं समा जाऊँ,
दुनिया वालों के सवालों के जवाब कैसे दूंगी मैं।

कोई कमी निकालेगा संस्कारों में,
किसी को परवरिश में कमी नजर आएगी,
तुम ही कहो, कमी मेरी नहीं, ये हिसाब कैसे दूंगी मैं।

कितनी बदनसीब हूँ मैं,
कैसे बेटे को जन्म दिया मैंने,
जिसके कारण तबाह दो परिवार हो गए।

“सुलक्षणा” ना जाने कितने माँ बाप,
बस यही सोचकर अपने मन में,
खाकर ज़हर की पुड़िया सदा सदा के लिए सो गए।

©® डॉ सुलक्षणा

हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

मजबूरी में तन बिकते
शौक में मन बिकते
मंदिरों में दर्शन बिकते
हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

भूख में इंसान बिकता
धन में ईमान बिकता
मौके पर अहसान बिकता
हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

गरीबी में घर बिकता
दहेज में वर बिकता
काम में नर बिकता
हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

शराब में वोट बिकते
रसूख में खोट बिकते
राजनीति में कोट बिकते
हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

कुर्सी खातिर खादी बिकती
सुर्खियों में बर्बादी बिकती
लालच में आजादी बिकती
हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

पुरस्कार में कलम बिकती
फैशन में शर्म बिकती
वक़्त पर मरहम बिकती
हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

नाम से धर्म के ठेकेदार बिकते
हालात से व्यवहार बिकते
चंद नोटों में विचार बिकते
हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

सारे रिश्ते नाते भी बिकते
कसमें वादे भी बिकते
सुलक्षणा इरादे भी बिकते
हर चीज बिकाऊ है दुनिया में

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

2 comments

  1. आपकी कलम और अदभुत सोच को सलाम,
    आपके लिखे शब्द नहीं मात्र, हैं यह वरदान ।।
    हे जगत नारी और मेरी बहन तुम्हें दण्डवत प्रणाम।।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *