मुक़द्दर समझना ”

बुढापा क़रीब आ जाये तो, मुक़द्दर समझना।
केस उजला लहराये तो,मुक़द्दर समझना।।

बचपन जो चला जाये तो, जी लें सयानापन।
बचपना रह जाये ज़िंदा, तो,मुक़द्दर समझना।।

रब जिसे चाहे, उसे सरताज बना डाले।
दिन हँसते कट जाये तो,मुक़द्दर समझना।।

मोहताज ज़िंदगी हो, मालिक करे न ऐसा।
मरहम कोई लगा जाये तो,मुक़द्दर समझना।।

ज़िद्द हराने की लिये, बैठे हैं बहुत से लोग।
सहारा कोई बन जाये, तो,मुक़द्दर समझना।।

पंडित अनिल
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित
अहमदनगर,महाराष्ट्र
8968361211

बेटियाँ

सरहद पर सेना के संग कोहराम मचाती बेटियाँ।
आसमान में देखिये वायूयान उड़ाती बेटियाँ।।
तूफ़ानों का चीर कलेजा धूम मचाती बेटियाँ।
दुष्ट दुश्मनों के सिर पर तूफ़ान हो जाती बेटियाँ।।

रोशन करती घर को घर की नाम हो जाती बेटियाँ।
फ़िर भी कुंठित कोख में क्यूँ ग़ुमनाम हो जाती बेटियाँ।।
बेशक़ीमती नेंमत हैं ये कब संसार ये जागेगा।
बदनेक़ी करते बेटे बदनाम हो जाती बेटियाँ।।

हया शरम सब इनके ज़िम्मे ख़ानदान चलाती बेटियाँ।
बुरी नज़र से घायल लहूलुहान हो जाती बेटियाँ।
बदनींयत बेरहम आदमी की कलुषित कूचालों में।
झूठे प्रेम के जाल फँसी क़ुर्बान हो जाती बेटियाँ।।

जिनसे सृष्टि संरचना क्यूँ जान गँवाती बेटियाँ।
निज की है तो आँखें इज़्ज़त जान हो जाती बेटियाँ।।
दूजे की फ़िर क्यों कैसे सामान हो जाती बेटियाँ।।
जिनसे धर्म का ताना बाना है ईमान का जलता दीप।
क्यूँ नहीं घर घर की फ़िर भगवान हो जाती बेटियाँ।।

पंडित अनिल