ग़ज़ल
इतने क्यूँ तू सबाल करता है
जीना सबका मुहाल करता है

दिन हैं देखे बुरे तो हमने भी
उनका काहे न ख्याल करता है

आदमी काश आदमी होता
वो तो टेढ़े कमाल करता है

प्यार मोहबत अब नहीं दिखते
जिन्दगी का ये हाल करता है

काम आता नहीं किसी के भी
अपनी वारी बवाल करता है

आगे बढ़ने की बात भी कर ले
सोच पिछली बहाल करता है

जो मिले कर गुज़ारा उसमें ही
ब्यर्थ ही क्यूँ मलाल करता है

भूलने है लगा वो महनत अब
अपना जीवन निढाल करता है

दूसरों की मज़ाल वो सुन ले
अपनी ही बस सँभाल करता है

अच्छे वो लोग अब नहीं मिलते
कौन यूँ देखभाल करता है

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हिप्र

खूबसूरती का दूसरा नाम है “खज्जियार”