गांव शहर सा लगने लगा

गांव अब शहर सा लगने लगा है,
बचपन की स्मृति में शामिल ,
वानस्पतिक दांतुन मुंह में डाले नहीं दिखता कोई,
अब टूथब्रश मुहं में डाल झाग निकालते दिखते है सब।
वो ऊखल मुसल,शिल्ह बौतू,
लुप्त हो गए है,
तकनीक का उनपर अतिक्रमण हो गया है अब।
नरेल टुठी(हुक्का) मुंह में लगाए बुजुर्ग,
इधर उधर किस्से कहानियां बुजुर्गों के अनुभव सुनते युवा,
यह दृश्य भी कहीं खो गया है।
बहुत बदला गांव का माहौल अब,
और बदलता जा रहा है,
“परिवर्तन प्रकृति की नियति है”
मगर बचपन के गांव की स्मृति अदभुत है।
बचपन का गांव याद बन गया है अब,
गांव अब शहर सा लगने लगा है ।

वीपी ठाकुर,
कुल्लू