तुम दाखिल होना मेरे दिल में कुछ इस कदर कि
शोर उठे यहाँ से तो बस तेरे नाम की ही उठे

आग लगाना तो फिर ख्याल इतना जरूर रखना
ये शोला बुझे तो फिर तेरे शबाब से ही बुझे

मैंने हलफनामा तो नहीं डाला तेरे इकरार का
ले जाएगी जहन्नुम तक तेरा इन्कार ही मुझे

पास हूँ तो अहसासों के काबिल नहीं हूँ मैं
दूर जाऊँगा तो कर जाऊँगा बेशक बेक़रार ही तुझे

मुकम्मल न हो पर इश्क़ मुसलसल तो हो
फिर क्या फर्क पड़ता है रहें सारे अफसाने ही अनसुलझे

सलिल सरोज

चलो आज पर्दा करने की रवायत ही गिरा देते हैं
निगाहों में कुछ आरज़ू जला लेते है,कुछ बुझा देते हैं

आने वाली तमाम नस्ल की खातिर ही सही
एक चाँद आसमाँ तो दूजा हथेली पर उगा देते हैं

हो गया सारा मंज़र लहू लुहान और ये चुप रहा
मगरूर सूरज को अँधेरे में छिपाकर सज़ा देते हैं

सियासी हलफनामों का शोर बंद कर के
कुछ देर हम मासूमों को भी ज़बाँ देते है

तुम आओ जो बनके आफ़ताब कभी,तो फिर
हम खूबसूरती के पैमाने तमाम छिपा देते हैं

सलिल सरोज