लकीर : नारी के पाँव में जकड़ी एक बेड़ी

नारी के पाँव जकड़े, ऐसी मिटा लकीर।
तू नारी का वीरना, आगे बढ़ शिववीर।।

पैदा हुई फूल सी कोमल बिटिया,
जटिल समस्या की वो हल बिटिया।
कोसा समाज ने हाथ की लकीर को-
आई ले गई सुख के पल बिटिया।।

नारी के पाँव जकड़े, ऐसी मिटा लकीर।
तू नारी का वीरना, आगे बढ़ शिववीर।।

खड़ी गुड़िया ले बस्ता चौखट तीर,
समाज ने खींची फिर एक लकीर।
गाँव से बाहर पढ़ने नहीं पाई-
हृदय भी रोया नहीं समायी पीर।।

नारी के पाँव जकड़े, ऐसी मिटा लकीर।
तू नारी का वीरना, आगे बढ़ शिववीर।।

घर में ही बंधक बन रह गई,
छोटी बड़ी ताने सब वो सह गई।
बेड़ी बन जकड़ रखी थी लकीर-
उसकी हरेक तमन्ना ढह गई।।

नारी के पाँव जकड़े, ऐसी मिटा लकीर।
तू नारी का वीरना, आगे बढ़ शिववीर।।

गर्भावस्था की वो उभरती लकीर,
भूरे रंग की थी वो बढ़ी छाती पीर।
पोती होगी इस भय से सासू माँ ने-
किया भ्रूण हत्या बहू का पेट चीर।।

नारी के पाँव जकड़े, ऐसी मिटा लकीर।
तू नारी का वीरना, आगे बढ़ शिववीर।।

★★

– प्रणव भास्कर तिवारी शिववीर
– पूरे ब्राह्मण, महुलारा
– राम सनेही घाट बाराबंकी
– उत्तर प्रदेश