सलिल सरोज जी की रचनाएं

आँखों में नशा,जिस्म में खुमारी है
मेरे इश्क़ का सफर अभी जारी है

मुझे देख वो हया में लिपट जाती हैं
कुछ तो है ऐसा जिसकी राजदारी है

इश्क़ कैसे न हो बेसबर कोई तो बताए
जब हुश्न के कयामत ढ़ाने की तैयारी है

वो खुदा,ये कायनात सब तो उसके कायल हैं
न जाने इस आफ़ताब में जलने की किसकी बारी है

उनके कुछ ख़्वाब मेरी ही आँखों में जागते हैं
मानो कि उनकी नींदों की मुझपे उधारी है

अभी तुम नासमझ हो नहीं समझ पाओगे कि
हुश्न ने बेऔज़र होके भी कितनी जवानियाँ मारी है

सलिल सरोज

मुद्दा ये नहीं है कि मसला हल हो जाए
उनकी ये जिद्द है कि अब जाँ ही निकल जाए

एक रोटी,एक बेटी की म्यार ढाह दी गई
उनका मकतब है कि ये माहौल बदल जाए

आँखों का नीलम,आग बन के लहूलुहान हो गया
तंगदिली की भूख कहती है कि सब निगल जाएँ

ये रिवायत,ये लज़ीज़ नफ़ासत कब तक बची रहेगी
जिस्म नोचती इस दौर में अब तो हर ग़ज़ल जाए

हम खुद की फेरहिस्त में कितने गलीच हो गए कि
हमारे इंसाँ होने के मायने पूछती हर नस्ल जाए

सलिल सरोज

जिसे चाहिए वो खुद इस के तस्सवुर में आए
इश्क़ भी कभी औरों के भरोसे की गई है क्या

मेरी प्यास बुझाने को ये मैक़दे अभी नाकाफ़ी हैं
तुम्हारी निगाहों के सिवा भी मुझसे पी गई है क्या

चाँद होगा हुश्न का माहताब आसमाँ में
इस ज़मीं पे हुश्न की मिसाल तुम्हारे अलावे दी गई है क्या

तुम्हारे तबस्सुम में जो ये लपकता शरारा है
बताओ तो ज़रा ये आग सूरज को बुझा कर ली गई है क्या

कस्तूरी सी ये फ़िज़ाएँ महकने लगी है अचानक
देखना तो ये हवाएँ छूके तुम्हें भी गईं हैं क्या

सलिल सरोज

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *