*हवा में तैराकी

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मंदिर गया मस्जिद गया ढूंढता रह गया सकीना
गिरते चौखट से गुजरते मिल गया मंदिर और मदीना।

भले पेट पीठ थी पर नींद की गोली न थी
चले चप्पू तेज जिनका डूब जाती है उनकी सफीना।

मद्धम आंच पर हो रोशनी तो उजला-उजला रहता है घर
अंजाम दहकते अंगारों का ऐसा कि खत्म हो जाता है जीना।

यूं तो घिरा रहता है साहिल भी तूफानों से हरदम
पर मिलता है जमीं से जज्बा और चौड़ा रहता है सीना।

हवा में तैराकी से अच्छा चलें बेनिशां राहों में
मिल जाता है किनारा भी बस बहाना पड़ता है पसीना।

उसूलों के सफर पर टिकी होती है नींव कामयाबी की
गिद्धों के झुंड से क्या डरें जब दिल हो अपना करीना।

शमां के पास आ जाते हैं कीट-पतंगे अक्सर
जल जाते हैं जलने वाले और बन जाते हैं जुगनू नगीना।

सकीना :- शांति
सफीना :- नाव, कश्ती
करीना :- साफ-सुथरा
नगीना :- बहुमूल्य।
*दीपक भारद्वाज*