अर्पन, तर्पन में कितना लगता है/पंडित अनिल

अर्पन, तर्पन में कितना लगता है “

अर्पन में, समर्पन में, तर्पन में, कितना लगता है।
तिल-तंदुल, जल के खर्चन में ,कितना लगता है।।
श्रद्धा – भाव से, अभिनंदन में,कितना लगता है।
अर्पन में • • •

पुरखे हुवे अपरिचित से,हैं अनभिज्ञ से मौन।
पूछते हो तुम,निज कंण रग से,आख़िर हैं ये कौन।।
पितर पक्ष, अमावस अर्चन में कितना लगता है।
अर्पन में • • •

कहते हैं प्रतिबिंब, उतरता है निश्चित संतति में।
पूर्वज क्या नहीं,भरता है,निश्चित संतति में।।
पुष्प पदारथ से,वंदन में कितना लगता है।
अर्पन में • • •

पक्षी बन, आयेंगे पुरखे, है सोच यह कैसी।
कौआ बन खायेंगे,पुरखे , है सोच यह कैसी।।
जीते जी सेवा, चंदन में कितना लगता है।
अर्पन में • • •

पंडित अनिल
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित
अहमदनगर,महाराष्ट्र
8968361211

गुमाँ मत करना

ईमान रखना,इसे जुदा मत करना।
इंसान रहना,खुद को खुदा मत करना।।

ऊँचाईयाँ बहुत,कर देती हैं तन्हा।
ऊँचाइयों पर,इतना गुमाँ मत करना।।

तन्हा सफ़र,ज़िंदगी का है बोझिल।
दोस्त ऐसे,खुद को तन्हा मत करना।।

ज़मीन पर भी,सितारे मिल जाते हैं।
दोस्त!खुद को,यूँ आसमाँ मत करना।।

प्यार में,हर कदम धोखे हैं अनिल।
प्यार किसी से,यूँ बे-इंतेहाँ मत करना।।

पंडित अनिल
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित
अहमदनगर,महाराष्ट्र
📞 8968361211

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