पंडित अनिल जी की शानदार रचनाएँ

अपकार नहीं रखना

मन भर जीना है तो मन में भार नहीं रखना ।
निर्मल है इसमें कोई कुबिचार नहीं रखना ।।

सद्भावों से सिंचित करना फूल खिलेंगे हमराही ।
कर देना उपकार बाँध अपकार नहीं रखना ।।

धरती तारे गगन चंद्रमा देते हैं बिन लेखा ही ।
तुम लेखा जोखा कर मन में ज्वार नहीं रखना ।।

सभी सयानें कहते हैं संसार में सब कुछ धोखा है।
दिल में प्यारे भूले से भी संसार नहीं रखना ।।

बहुत काँरवा आयेंगे जायेंगे दिल के स्टेशन ।
अच्छी यादें रखना ग़र्द ग़ुब्बार नहीं रखना ।।

नहीं जरूरी है हर कोई मन का मीत मिले ।
फूल नहीं पर किसी राह पर ख़ार नहीं रखना ।।

बहुत है महंगी प्यार की बोली देखा अनिल जमाने में।
तुम भी कड़वी बोली की दीवार नहीं रखना ।।

पंडित अनिल
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
अहमदनगर , महाराष्ट्र

साकार कर

ज़िंदगी अनमोल है,तूँ इसको प्यार कर।
ग़र ख़िजाँ भी लगे,तो इसको बहार कर।।

मुश्किलों के सिर पे, रख कर पाँव चल।
मुश्किलों को इस तरह , मत पहाड़ कर।।

पतझड़ सदा रहता, नहीं संसार में ।
फ़िर खिलेंगे फूल , जरा इंतज़ार कर ।।

ख्वाब आँखों में सजाये, सो गया था ।
नींद से अब जाग, उठ साकार कर ।।

पंडित अनिल

जबाब रखिये “

नखरे रखिये , हुज़ूर नाज़ रखिये ।
मये क़ायनात का, ताज़ रखिये ।।

चटक जाती है ज़िंदगी, आबग़ीनो सी ।
कुछ तो शरमो-हया का, हिजाब रखिये।।

वहाँ होगी नहीं कोई , सल्तनत अपनी ।
अपनें करम का खुद ही , हिसाब रखिये।।

बही खाते ख़ज़ाने , यहाँ सम्हालिये लेकिन ।
वहाँ के लिये भी , तारीफ़-ए-किताब रखिये।।

वहाँ का जज है बहुत ही, पाक़ीजग़ी पसंद ।
वहाँ के लिये भी , कुछ सच्चे जबाब रखिये ।।

डरिये मगर उस दो जहाँ के,मालिक से।
अनिल तौबा तल्ख़ ,नर्म-ए-मिज़ाज रखिये।

पं अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र

जरा सम्हल कर

ऐंठकर इतराकर अँकड़ कर।
भाई जरा चलिये सम्हल कर।।

ज़िंदगी जालिम है है बेवफा भी।
असर दिखा देती है उछल कर।।

जिगर रखिये भाई समंदर सा।
हासिल क्या किसी से जल कर।।

आबरू रखिये हर गुलशन का।
फेंकेते क्यों कलियाँ मसल कर।।

मुश्किलें सिर झुका लेंगीअनिल।
पहेलियाँ पहले खुद हल कर।।

पंडित अनिल

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