ग़ज़ल
दुआ करते हैं लेकिन साफ तो अंदर नहीं होता
कहीं भी कर लो पूजा हर जगह मंदर नहीं होता।

ये टुकड़ा है जमीं का माँ है अपनी क्यूँ नहीं सोचा
बहे दुश्मन का खूँ क्यूँ हाथ में खंजर नहीं होता।

जहां रोटी मिले खा ले मिटानी भूख है हम को
कमा कर गर मिले यूँ हर जगह लंगर नहीं होता

उगाना अन्न तेरा फर्ज है अनदाता भारत के
जमीं का कोई भी टुकड़ा कभी वंजर नहीं होता

है कैसी कैसी अपनी सोच इस दो पल के जीवन में
चढ़े से पौड़ी कोठे की कोई कंजर नहीं होता।

न हो वारिश कहीं पर भी तो कुदरत है यहां दोषी
लगाये होते तुमने पेड़ तो चंगर नहीं होता

ये सच है आदमी को आदमी होकर ही जीना है
है कोई आदमी भी आदमी डंगर नहीं होता।

क्यूँ सीने में मेरे जलती है तुमको भी पता तो है
जो तुम होते मेरे हम दम तो ये मंज़र नहीं होता।

हवाओं की ये हठधर्मी न होती अपनी भी दुष्मन
जो नदियाँ साफ होतीं खारा ये समँदर नहीं होता।

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हिप्र