दो कविताएँ

बेटी की लाश उठाये गोदी में,
कह रहा पिता दम नहीं है मोदी में।
इन लाशों का हिसाब देना होगा मोदी जी,
एक दिन हर सवाल का जवाब देना होगा मोदी जी।
झूठा निकला बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा,
बलात्कार करके हर रोज बेटियों को जा रहा है मारा।
चुप्पी अपनी तुम भी तोड़ डालो मोदी जी,
वरना 56 इंची सीना कहना छोड़ डालो मोदी जी।
विपक्ष भी चिल्ला रहा है कड़ा कानून बनवाने को,
फाँसी की सजा तय कर दो, बेटियों को बचाने को।
किस चीज का भय है आपको, क्यों नहीं कदम उठाते हो,
हवस के इस नंगे नाच पर क्यों नहीं आप चिल्लाते हो।
सीने पर हाथ रख सोचना, हो ऐसा खुद की बेटी के साथ,
क्या बीते दिल पर आपके, रह सकते रखे हाथ पर हाथ।
खुद का सीना छलनी होने पर ही दर्द का पता चलता है,
हमारे वोटों की भीख पर नेता बनकर ऐश लेना खलता है।
कब तक हमारी तकलीफों पर रोटियाँ सेंकते रहोगे,
कोरे आश्वासनों के टुकड़े हमारी तरफ फेंकते रहोगे।
मोदी जी बस बहुत हुआ, बेटियों को इंसाफ दिलाओ,
वरना भारत माँ की बेटियों से टकराने को तैयार हो जाओ।
अब भी वक्त है सुन लो पुकार हम बेटियों की प्यार से,
वरना “सुलक्षणा” घुटने टिकवायेगी कलम हथियार से।

©® डॉ सुलक्षणा

मजबूरियों की खबर नहीं रखता,
दिल मे अपने वो सब्र नही रखता।
एक हो जाएं हम दोनों सदा के लिए,
दुआओं में इतना असर नहीं रखता।

इस ज़माने की वो फिक्र नहीं करता,
मेरी बातों में अगर मगर नहीं करता।
हे सखी! बस एक ही कमी है उसमें,
घरवालों से मेरा वो जिक्र नहीं करता।

चट्टानों से टकराने का जिगर रखता है,
सखी मोहब्बत भरी वो नजर रखता है।
जमीं पर पड़ने नहीं देता है मेरे पैरों को,
फूलों से भरी हमेशा मेरी डगर रखता है।

मेरे जज्बातों की वो कद्र करता है,
कभी कभी नहीं वो अक्सर करता है।
लिखती है “सुलक्षणा” जब भी कुछ,
वाह वाह वो पढ़कर हर अक्षर करता है।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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