काव्य महक में आज की खूबसूरत रचनाएँ

भारत का खजाना के “काव्य महक” संस्करण में आज पढ़िये ये सुंदर रचनाएँ।

रचनाकार:- रमेश चन्द्र मस्ताना
1. बेदर्द
2. केवल आपके लिए

बेदर्द
दिल में उतर गए कि, दिल से उतर गए ।
लाख पूछा हमने मगर, वो साफ मुकर गए ।।

हमने तो रामसेतु बिन, लांघ लिए समन्दर ।
वह धीरे से खिसक कर, सीधी सड़क उतर गए।।

मिलन की आस में, हम दूर तलक चले ।
खाईं जो ठोकरें तो, सारे सपने बिखर गए ।।

यहां भी तो ढूंढा, उन्हें वहां भी तलाशा ।
चहुं ओर ही पुकारा, न जाने किधर गए ।।

सालों से थे संभाले, अरमानों के जो खतूत ।
इक्क रात में ही चूहे, सब कुछ कुतर गए ।।

वायदे किए थे हमसे, वो निभाए नहीं कभी ।
हमने तो इधर बुलाया, वो चले उधर गए ।।

जो किए थे कौल – करार, सब हो गए बेकार ।
ऐसे हालातों मैं हम , क्यों ना सुधर गए ।।

वो चांद जैसा मुखड़ा, दिलकश थीं जो अदाएं।
मंज़िलों की वो चाहत, सब अरमां बिखर गए ।।

हसरतें जो थीं पालीं , और सपने जो थे देखे ।
शीशे-से चटक कर, चहुं ओर छितर गए ।।

सहेजने के क्रम में, की लाख कोशिशें मगर ।
मस्ती के ख्वाब सारे, “मस्ताना” बिखर गए ।।

दिल में उतर गए कि, दिल से उतर गए ।
लाख पूछा हमने मगर, वो साफ मुकर गए ।।

रमेशचन्द्र “मस्ताना”,
मस्त-कुटीर : नेरटी, ( रैत ),
तह. : शाहपुर, कांगड़ा, हि. प्र.
176208.
मो. : 94184-58914.

केवल आपके लिए

देखे जो हसीन ख्वाब, केवल आपके लिए ।
बुने सपने बे – हिसाब, केवल आपके लिए ।।

अपने लिए तो हमने, कभी कुछ किया नहीं ।
जो कुछ भी किया है, केवल आपके लिए ।।

खुद के लिए न सोचा, न विचारा कुछ कभी ।
जो कुछ भी संवारा , केवल आपके लिए ।।

पल-पल तलाशी खुशियां, बटोरे तमाम लम्हें ।
चन्द सांसें बचा के रखीं, केवल आपके लिए ।।

यूं तो मिलने की कभी, फुरसत ना थी हमें ।
बनाया जो कभी बहाना, केवल आपके लिए ।।

डुबकियां लगा के हमने, ढेरों निकाले मोती ।
माला तो बनाई एक ही , केवल आपके लिए ।।

वायदे वफा की कसमें, ना खाईं ना खिलाईं ।
“मस्ताना” जो भी पड़ीं निभानी, केवल आपके लिए ।।

देखे जो हसीन ख्वाब, केवल आपके लिए ।
बुने सपने बे-हिसाब, केवल आपके लिए ।।

रमेश चन्द्र “मस्ताना”,
मस्त-कुटीर : नेरटी, ( रैत ),
तह. : शाहपुर, कांगड़ा, हि.प्र.
176208.
मो. : 94184-58914.

2. रचनाकार :- डॉ सुलक्षणा
1. हर चीज बिकती
2.कितना मुश्किल था

हर चीज बिकती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।

चाय की दुकानों में, ऊँचे ऊँचे मकानों में बिकता बचपन देखा मैंने।
गरीबी की मंझदार में, भुखमरी की मार में सिसकता बचपन देखा मैंने।
घर के खर्चे के लिए, माँ बाप के कर्जे के लिए बिकता तन बदन देखा मैंने।
किस्मत खोटी के लिए, दो वक़्त की रोटी के लिए तड़पता तन बदन देखा मैंने।
जिन्दगी सिसकती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।
हर चीज बिकती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।

चंद वोटों के लिए, कागज के नोटों के लिए बिकता नेता देखा मैंने।
फौजियों के सर कटने पर, चीन के अंदर घुसने पर दबता नेता देखा मैंने।
अपने स्वार्थ के लिए, अपने वंशवाद के लिए होती राजनीति देखी मैंने।
देश हित के लिए, हिन्दू मुस्लिम प्रीत के लिए सोती राजनीति देखी मैंने।
भारत माता बिलखती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।
हर चीज बिकती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।

बेटी की पढ़ाई लिखाई के लिए, बेटी की ब्याह शगाई के लिए बिकता बाप देखा मैंने।
दहेज़ के लिए मार डालने पर, दहेज़ के लिए घर से निकालने पर बिलखता बाप देखा मैंने।
औलाद की भूख के लिए, औलाद के सुख के लिए बिकती माँ देखी मैंने।
अपना तन ढंकने के लिए, अपना पेट भरने के लिए तरसती माँ देखी मैंने।
औलाद के लिए दुआ निकलती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।
हर चीज बिकती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।

घर चलाने के लिए, नौकरी पाने के लिए बिकता बेरोजगार देखा मैंने।
भावनाओं को दबाये, डिग्रीयों को उठाये फिरता बेरोजगार देखा मैंने।
खाद बीज दवाई के लिए, फसल की बुआई कटाई उठवाई के लिए बिकता किसान देखा मैंने।
सूखे की मार में दबा, बाढ़ के पानी में डूबा मरता किसान देखा मैंने।
दुनिया रंग बदलती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।
हर चीज बिकती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।

चंद सिक्कों की खनक में, फैशन की चमक में बिकता ईमान देखा मैंने।
झूठ के बोझ के नीचे, झूठे यश के पीछे रपटता ईमान देखा मैंने।
दो वक़्त के खाने में, थोड़ा सा ललचाने में बिकता इंसान देखा मैंने।
धर्म की लड़ाई पर, स्त्री पराई पर मरता इंसान देखा मैंने।
हर बुराई पर “”सुलक्षणा”” लिखती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।
हर चीज बिकती देखी यहाँ मैंने कदम कदम पर।।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

मेरी योनि से निकल कर/ डॉ सुलक्षणा


वर्तमान परिपेक्ष्य में दिन प्रतिदिन गिरते नैतिक मूल्यों पर प्रहार करती डॉ सुलक्षणा जी की ये रचना पढिये ऑनलाइन पत्रिका भारत का खजाना में।

कितना मुश्किल था

कितना मुश्किल था मेरे लिए उसको भुलाना,
जिससे मिलने की ताउम्र फरियाद करता रहा।

दिल में लिए उस हमदम से मिलने की आस,
तन्हाइयों के वीराने को मैं आबाद करता रहा।

मुझे और रब को पता था वो बेवफा नहीं थी,
मेरी थी वो, इसीलिए वाद विवाद करता रहा।

मजबूरियों की बेड़ियों ने जकड़ रखा था उसे,
पर उसके इंतजार में समय बर्बाद करता रहा।

अपनी मोहब्बत का वास्ता दे गई भूल जाने को,
बस यूँ खुद सीने को दर्द से फौलाद करता रहा।

मिले कैसे छुटकारा “सुलक्षणा” की यादों से,
ताउम्र मैं इस तकनीक को ईजाद करता रहा।

©® डॉ सुलक्षणा

http://www.bharatkakhajana.com/category/काव्य-महक/

रचनाकार :- राजेश पुरोहित
1.सियासत
2. बेटियाँ

कविता

सियासत के खेल में
जनता की होती हार
जीत जाते नेताजी
संसद तक पहुंचते
जनता के लिए
नित नए फैसले
जनता को सुनाते
गरीबी भुखमरी
बेटोजगारी से
लड़ती जनता
नेताजी फिर
पांच साल बाद
दस्तक देते
वोट के लिए
हाथ फैलाते
जनता समझती
होगी जीत
आज हमारी
कवि राजेश पुरोहित
भवानीमंडी

कविता

बेटियां

हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही बेटियां
दुनियाँ में परचम लहराती बेटियां

कुकृत्यों का साम्राज्य सारा खत्म
मुंहतोड़ जवाब देने लगी है बेटियां

आत्मरक्षा के गुर सीखने लगी है
मुक्त गगन में उड़ने लगी है बेटियां

ओलम्पिक में गोल्ड जीतती है वो
देश का ऊंचा नाम करती बेटियां

जुर्म सारे घुट घुट कर नहीं सहती
खुल कर अब बोलने लगी बेटियां

कवि राजेश पुरोहित
श्रीराम कॉलोनी
भवानीमंडी

सम्पादक
भारत का खजाना
आशीष बहल

http://www.bharatkakhajana.com/category/देशभक्ति/ashish_behal_poetry/

2 comments

  1. आदरणीय भाई मस्ताना जी, डा० सुलक्षणा जी और राजेश पुरोहित जी, बहुत ही सुन्दर रचनायें सभी की। बधाई जी।

  2. शानदार रचनाओं के लिए बहुत बहुत बधाइयां..

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