काव्य महक की शानदार रचनाएँ पढ़िए यंहा

काव्य महक के तीसरे सप्ताहिक संस्करण में आज पढ़िये ये शानदार रचनाएँ।

रचनाकार:- सुदेश दीक्षित
दो ग़ज़लें


ग़ज़ल / कहां सुनता है

मुझे मिट्टी होने की यूं सज़ा देता है ।
मार मार कर मुझे चाक पे चढ़ा देता है ।।

मेरे रोने धोने को कहां सुनता है वह ।
मेरे नंगे वदन पर वह हाथ फिरा देता है ।।

पुचकारता,बहलाता है मुझे वह प्यार से ।
फिर नया खिलोना मुझे वना देता है ।।

सुबह सवेरे उठा कर कर सर पर मुझे ।
ले जा बाजार मे बिकने को सजा देता है ।

कीमत दूँ भी क्या उसके प्यार दुलार की ।
कभी धूप तो कभी छाया में सुखा देता है ।।

ठिठुरने देता ही नहीं कभी ठंड़ से मुझे ।
तपा कर आग मे मेरी औकात बढ़ा देता है ।।

भगवान का दूजा रूप है कुम्हार “दीक्षित”।
मिट्टी को मांझ कर क्या से क्या वना देता है ।।

सुदेश दीक्षित

ग़ज़ल
——‘-”””–‘
पहले बहलाया ,फुसलाया गया मैं ।
बकरा बना कर बलि चढाया गया मैं ।।
सबूत मुलज़मों के इकट्ठे करके जो दिये ।
इसी गुनाह में मुलज़म वनाया गया मैं ।।

मेरी आबाज बन जो लडे नफरत से ।
आबाज ऊंची न करूं तभी तो दवाया गया मैं ।।

दम भरते थे मेरी दोस्ती का जो हरपल ।
उन्ही के द्धारा हरबार ठुकराया गया मैं ।।

अब नही रही पूछ घर मे कोई मेरी ।
इक रिस्ते की तरह निभाया गया मैं ।।

सयासत खूब हुई मेरी लाश पर देखो ।
न जलाया न दफ़नाया गया मै ।।

आग जनी का अंदेशा था जलाने,दफ़नाने में ।
इस लिये पानी मे बहाया गया मैं ।।

न हिँदू ,न मुसलमां, नसिख,न ईसाई ।
फिर फसाद की जड क्यों वनाया गया मैं ।।

नहीँ लिया फैसला “दीक्षित”को पूछ कर कोई ।
बताओ फिर क्यों कर सूली चढाया गया मैं ।।

सुदेश दीक्षित

भारत माँ की बेटी हूँ/आशीष बहल

रचनाकार :- जग्गू नोरिया
जिस तन लागे
सुबह हुई पख़ेरू

जिस तन लागे

जिस तन लागे सो तन जाने,
गलती पर गलती करते रहे,
गलती फिर भी न कोई माने,
होशि़यार की होशियारी देखो,
नित गढ़ता रहा नए बहाने,
जागरूक होगा प्रशासन
कड़ी रहेगी नजर सुनते रहे हैं,
काटते रहे चालान आजतक,
होते हादसे रखते नहीं मायने,
लगता तो यह है शायद,
विभाग बन गये हैं ऱिश्वत के,
बड़े बड़े कारखाने,
कहीं भी चले जाईये ,
बिन हरे हरे दिखाये
काम नहीं होते
गढ़ देते नए नए बहाने,
गर जरा आपने कानून की
बात कही,
देखिए कैसे कानून का पाठ
लगते हैं वो सिखाने,
भूल जाओगे जनहित की बात,
करना
खुद को ही कोसेंगे
पास रहेंगे फ़साने,
सोचते सोचते जिंदगी बीत
जायेगी,
कह गए बात पते की यह
स्याने,
आज कितनी माँ की गोद
सुनी ,बहन का भाई
भाई की बहन और
न जाने कितने रिश्ते
खत्म हुए हैं तनिक
लापरवाही से,
क्या से क्या हो गया,
निकले थे भविष्य
उज्ज्वल बनाने।।।

जग्गू नौरिया
परवाणू सोलन
9418557929

सुबह हुई पख़ेरू

सुबह हुई पख़ेरू चहकाये,
सुनते हैं आवाज मधुर
जो इनकी,
भागदौड़ की दुनिया में,
सही जीवन बही लोग जी पाये।
बैसे भी आधुनिकता की आड़ में,
कितने खाद्यान जहरीले हो गये,
कहते हैं पानी तक दुषित हुआ है,
फल फूल भी नशीले हुये हैं,
चलना दुर्भर हुआ है प्राणी का,
चिकने राह भी कंटीले हुये हैं,
भोजन की गुणवत्ता खत्म हुई है
जब से कुकर प्यारे दूर पतीले हुये हैं,
वरकत की तो बात कैसे करें,
दादी से दूर जब से चौंके चुल्हे हुये हैं,
सुनाई देती नहीं पायल की खनक,
चुड़ियों की खनखन्नाट ,
आँगन आँगन बंटवारे जब से हुये हैं,
कथनी करनी में अन्तर बहुत हुआ है,
जब से संस्कार बनावटी हुये हैं
सुबह के गहने सब खत्म हो गये,
मक्खन निकालती नहीं दिखती नानी अब,
जब से दूध दही हवाले बाजार हुये हैं,
बैलों के गले नहीं वजती अब घंटियाँ,
मशीनों के सहारे खेत सब हुये हैं,
हल्की हल्की महक बिखेरती पवन ,
बीते जमाने की कहानी हुई है,
जब से जंगल बनकाटुओं के ,
नदियाँ खनन माफियों के और गली कूचे
प्रदूषित कारखानों के हवाले हुएे हैं,
कैसे करें बात जान माल सुरक्षा की ,
सुना है कहते लोगों को कि,
बैंकों में अन्धाधुन्ध घौटाले हुए हैं,
देश बचाना टेढी खीर लगती है अब,
जब से खजा़ने लुटेरों के हवाले हुये हैं,
सुबह का दर्द जाने कौन कैसे ,जग्गू,
नित रोज प्यारे छलकते जाम प्याले हुये हैं।।
परवाणू
जग्गू नौरिया
अप्रकाशित मूल रचना
9418557929

रचनाकार:- गोपाल शर्मा
मैत्री बांछित है
माँ

🛎मैत्री बांछित है🛎

गगनचुंबी भवन,
विकास के गीत गाते हैं।
कम होते जंगल,
विनाश की आहट सुनाते हैं।
उत्पादकता को बढ़ाते कारखाने,
समृद्धि का संदेशा हैं।
चिमनियों से निकलता धुआं,
व्याधियों का अंदेशा है।
गलेशियर पिघल रहे हैं,
इन्सानी बस्तियों को निगल रहे हैं।
भूस्खलन से पथ अवरुद्ध हैं।
लक्षण प्रगति के विरुद्ध हैं।
ओजोन परत खंडित हो रही है।
भूचालों से धरा दंडित हो रही हैं।
अस्वच्छता से परिवेश लांच्छित है।
पर्यावरण से मैत्री बांच्छित है।

गोपाल शर्मा,
जय मार्कीट ,
काँगड़ा हि.प्र.

🛎🛎माँ🛎🛎

लोरी, झूला और खिलौने,
सब में माँ समाई है।
मेरा हर एक अच्छा काम,
माँ की ही परछाई है।
मेरी चिन्ता और चिंतन सब,
माँ की आंखों में दिख जाता।
मेरे दुख में मुझसे ज्यादा,
माँ ने पीड़ा पाई है।
माँ के लिए तो केवल मैं ही,
सपना और हकीकत हूँ।
मेरा साथ ही रौनक माँ की,
वरना मेला भी तन्हाई है।
मुझको देख कर खिल जाती माँ,
नहीं दिखा मैं तभी तो माँ मुरझाई है।
बड़े नसीबों बाले हैं वे,
माँ जिनके हिस्से आई है।

गोपाल शर्मा,
21, जय मार्कीट,
काँगड़ा, हि.प्र.।
09816340608
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रचनाकार :- आवेग जायसवाल
गंतव्य
नंगी भूख

गंतव्य
——-
एक आग जला रहा कोई मुझमें है,,
जीता हुआ जमाना कोई मुझमें है।।

अब दिल तो धड़कना छोड़ चुका है,,
बोझिल साँसें चुराना कोई मुझमें है।।

हर काश का वो आश दिलाती रही,,
सब्र टूटता सा पुराना कोई मुझमें है।।

गली से गुजरता जो उनके खयाल में,,
देखेगी जरूर ये बहाना कोई मुझमें है।।

बहुत हुआ अब तेरा लुका छूपी का खेल,,
तुम्हारी जिंदगी सवारना कोई मुझमें है।।

आवेग जायसवाल

नंगी भूख
——–
जीवन में खत्म होगी कब भूख,,
भूख के आगे हम जा रहे सूख।।

मरी इंसानियत मरते हुए लोग,,
जिंदा इंसान यहाँ जा रहे सूख।।

तपती धरा है शोले गिराते नभ,,
बंजर हुए जमीन जा रहे सूख।।

कीतनो की आस तोड़ गई भूख,,
लाज बेची गई शर्म जा रहे सूख।।

देख आवेग रोया है बहुत बार,,
कैसे बताऊंगा गम जा रहे सूख।।

आवेग जायसवाल

खूबसूरती का दूसरा नाम है “खज्जियार”

रचनाकार :- दीपा कायथ
1 तुम हो
2 दिल में

तुम हो

बंद नैनों में तुम हो
खुली आँखों में भी तुम..

ख्बाब हो या हकीक़त
ज़हन में बस तुम ही तुम..

सोचते हैं तुम्हें न सोचें
मगर दिल पर जोर चला भला किसी का..

मृगतृष्णा से हो तुम
हाथ बढाऊँ तो जाने कहाँ छुप जाते हो..

अजब सी कशमकश है
सही और गलत के बीच की..

बस इतना सच पता है
जिंदगी से लगते हो तुम..

सांस आती है तेरे सामने होने से
दूर जाने के ख्याल से उखड़ती है सांसे…

हाँ रूह में बस गए हो तुम
जहाँ तुम और मैं हम हो गया है…

दीपा कायथ
कुल्लू हि0प्र0

दिल में

तुम यूँ आओगे इस दिल में
कभी सोचा न था..
यूँ बस जाओगे रूह में
कभी सोचा न था..
तेरी वो बेबाकियाँ
वो बेतकल्लुफ भरी बातें…
यूँ इस दिल को महकाएंगी
सोचा न था…

कितना नादान है यह दिल
जो एक झूठ को सच मान बैठा…
जिंदगी ढूँढने लगा उसमें…
इस क़दर दिल टूटेगा..
सोचा न था…

इतनी दुआ है खुशियां हो तेरी राहों में
हम राहों के हमसफ़र हो न हो
इस तरह अंत होगा इस खूबसूरत सपने का
सोचा न था

दीपा कायथ
कुल्लू हि0प्र0

सम्पादक
भारत का खजाना
आशीष बहल

धरती का स्वर्ग है जोत/Ashish Behal

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