काव्य महक की शानदार कविताएं पढ़िए

भारत का खजाना ऑनलाइन साहित्यिक पत्रिका में आज आप पढिये काव्य महक का प्रथम अंक। आज के इस अंक में आप पढेंगे जाने माने कवियों की दिल को छू जाने वाली रचनाएँ।

काव्य महक” भारत का खजाना

1. डॉ प्रत्युष गुलेरी
रचनाएँ शीर्षक :-
१.यह मिट्टी का आभूषण है
२फ़िक्र
2. श्री अशोक दर्द
१ गीत मोहब्बत के
२ मेरे पहाड़ में

3. पंडित अनिल
१.ज़ुबान के नहीं
२. युवा शक्ति हो

4. डॉ कुशल कटोच
१ आज धोलाधार
२. ऐ मन तू कब समझेगा

5. श्री विजय भरत दीक्षित
१. राम नाम दर्शन
२. पुकार

1. डॉ प्रत्युष गुलेरी
रचनाएँ शीर्षक :-
१.यह मिट्टी का आभूषण है
२फ़िक्र

यह मिट्टी का आभूषण है

डा प्रत्यूष गुलेरी
मंजिलेें स्वयं तय करनी पड़ती हैं वो कुछ भी क्यों न हों
बचपन, युवा, व्यस्क
और बुढ़ापे तक की
किसी के भी क्यों पर
कब तक लदते रहोगे
सोचो न!
बैसाखियां खड़ा कर सकती हैं
दौड़ना तो तुम्हें
अपने ही दम खम पर होता है
क्या करता है आदमी
दौड़ता ही तो रहता है
वो जो नहीं मिला
जो मिला है उससे बेख़बर!
यह जीवेषणा है
या लोभ मोह का समंदर
मुकद्दर में लिखा ही
सब जमा घटता बढ़ता है
कर्म कर भूल जाओ
हमने यह किया
या वह किया
यह करना कराना
गिराना उठाना
आदमी के हाथ का कहां है?
हम तुम सब करने कराने वाले
हैं ही कौन
वर्षों से वही काटते हैं फसल
जो अपने हाथों से बोई थी
उपकारों की दुहाई देना
अथवा उछालना फेंटना बार बार
किसी को भी उठाता नहीं
गिराता ही है स्वयं को
दूसरे की नजर में
जिसके हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं, कोई तीसरा नहीं
अत:जो बीत चुका है
उसके ग़म में
वर्तमान में प्रभु की दी इमानत को, खुर्द बुर्द मत करो
यह मिट्टी का आभूषण है
बेशकीमती
तिल तिल खरने न दो!

कीर्ति कुसुम,
सरस्वती नगर, पो गाड़ी 176057
धर्मशाला(हिमचल प्रदेश)

फ़िक्र
डा प्रत्यूष गुलेरी
सुबह जल्दी न उठूं तो
सुनने को मिलता है
उठ जाओ ज्यादा देर सोने से
खून का पानी बनता है
कभी घूमने न निकलूं तो
कहेंगी घूमने गए बहुत दिन हो गए हैं
क्या करते रहते हो
मोबाइल घुमाते स्क्रीन पर
नज़रें चुकाए, नज़र उड़ा लोगे
बस भी करो!
किताबों में मुँह मारता मिलूं तो
जुमला होगा, किताबों में ही गड़े रहोगे दिनरात
यह मनियारी उठाओ
चाय का प्याला रखने को
तिल भर जगह नहीं छोड़ते
अखबार पढ़ते खबरें सुनाऊं
तो कहती हैं, ढेर सारे घर के काम भी पड़े हैं
तुम क्या जानो -तुम क्या करोगे
उम्मीद भी नहीं रखती
अपना सब कुछ समेट कर रख लो, तो समझो मेरा आधा काम हो गया, यह नहीं मिल रहा
वह कहां है, सुनो
ऊंचा तो नहीं युवती?
हड्डियां -जोड़ दुखने की दर्द करूं, तो कहेंगी –
डाक्टर को दिखा लो
चला जाऊं डाक्टर के पास
दिखा आऊं -दवा ले आऊं किसी डाक्टर से, टीका लगा आऊं घुटने का, तो कहेंगे पूछ लेते
घुटने में टीका लगाने से पहले
मैं आपकी पत्नी हूं
घुटने में टीका लगाना
बड़ा ख़तरनाक होता है
सुन कर हंसता हूं कभी
स्तब्ध होता हूँ उसकी फ़िक्र से
भद्रे ! जीवन है ही ख़तरों का नाम, ख़तरों से इतना ही डरती हो, तो बंद कर रख लो मुझे
किसी डिब्बिया में
सहेज कर रख लो
ताकि हवा ही न लगे
पर हवा है ज़िंदगी
हाथ से फिसल -फिसल जाती है
और हमें फ़िक्र में
पूरी ज़िन्दगी का पता ही नहीं चलता !

कीर्ति कुसुम, सरस्वती नगर
पोस्ट दाड़ी-176057धर्मशाला
हिमाचल प्रदेश
मोबाइल 9418121253

2. अशोक दर्द
१ गीत मोहब्बत के
२ मेरे पहाड़ में

गीत मुहब्बत के

गीत मोहब्बत के ग़मों में गाना तुम |
दर्द छुपकर महफ़िल में मुस्काना तुम |

दुनिया कैसे कैसे नाच नचाती है |
अपने दिल के राज जरा बतलाना तुम ||

यह मत सोच कि सुनकर दुनिया रो देगी |
यारों से भी दिल के राज छुपाना तुम ||

आ बैठेंगे दिल की शाखों पे बिछुड़े |
मीठी यादों का दाना उनको पाना तुम ||

होकर दिल बेकाबू गजलें कह देगा |
थोड़ा-थोड़ा दिल को बस उकसाना तुम ||

पर्वत झुक कर कदमों पे आ जायेंगे |
हिम्मत से बस थोड़े कदम उठाना तुम ||

बंजर में भी सोना बस उग आएगा |
कोई दरिया खेतों तक पहुँचाना तुम ||

प्यार मोहब्बत रिश्ते आज बिकाऊ हैं |
सोच –समझ कर दिल को जरा लगाना तुम ||

मन का सारा अँधियारा मिट जायेगा |
रहबर के चरणों में शीश नवाना तुम ||

दौड़े आयेंगे वो खुद लाज बचाने को |
दिल की गहराईयों से उन्हें बुलाना तुम ||

मेरे पहाड़ में

मेरे पहाड़ में उगते हैं आज भी प्रेम के फूल ,
और घासनियों पर उगती है सौहार्द की दूब ;
घाटियाँ गूंथती हैं छलछलाती
नदियों की मालाएं ;
धूडूबाबा की तरह नाचते झरने ,
गाते हैं रान्झु फुलमू ,कुंजू –चंचलो और सुन्नी –भून्कू के प्रेमगीत ,
यहाँ लोग दौड़ते नहीं ,
सिर्फ सीना ऊँचा कर चलते हैं ,
यहाँ आज भी घर ,
घर ही हैं ;
लोगों ने इन्हें मकानों में नहीं बदला है ;
मेरे पहाड़ में कोई लापता नहीं होता ,
दूर –दूर तक खबर रहती है उसके होने या न होने की ;
आज भी यहाँ कुछ अनछुए रास्ते हैं
जिन पर सिर्फ देवता ही विचरते हैं ,
किसान आज भी सज्जन –मित्र पछे-परौहने भिखु-भंगालु औरचिडुओं-पंखेरुओं के नाम
कुछ दाने अपने खेतों में ,जरूर बीजते हैं
बूढ़ी ताई ने परंपराओं की पोटली आज भी संभाल कर रखी है ,
आ ज भी सत्यम-शिवम-सुन्दरम का वास है मेरे पहाड़ में …..||,

3. पंडित अनिल
१.ज़ुबान के नहीं
२. युवा शक्ति हो

ज़ुबान के नहीं

बखूबी जानते हैं दर्द फिर भी जानते नहीं।
वो मतलबी हैं अब हमें पहचानते नहीं।।

बेचैनियाँ भी उमर सी बढती रहीं मेरी।
दिल चीर दिखलाया मग़र वो मानते नहीं।।

हैरान हैं बस देखकर लब की हंसी मेरे।
क्या हो गया जो मिलते हैं ईमान के नहीं।।

सारा ग़ुनाह मेरा है क्या खूब फैसला।
दिखते ग़ुनाह अपने गिरहबान के नहीं।।

उम्मीद भी करें तो ऐसों का क्या अनिल।
जो रह सके हैं अपने ज़ुबान के नहीं।।

पंडित अनिल
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
अहमदनगर , महाराष्ट्र

युवा शक्ति हो

करते हैं जो कुंठित प्रतिभा के बाग़ को।
उठने मत दो जातिवाद के आग को।।

करने को हिफाज़त ले ली पूरी जिम्मेदारी।
ज़हर बीज बो देश से करते ग़द्दारी।।
होश मे आकर कुँचल दो ऐसे नाग को।
उठने मत • • • • •

दीमक जैसे चाट रहे भारत की तरुणाई।
मकसद नफरत फैलाते हैं ये दंगाई।।
बजने मत दो देशद्रोह के राग को।
उठने • • • • •

षड्यंत्री हैं खोद रहे सब कूँआ खाई।
जगो नौजवां हिम्मत तुमनें जो दिखलाई।।
काट दो ऐसे हर कुत्सित दुर्भाग को।
उठने • • • • • • • • • • •

स्व विवेक मेधा का दीप अखंड जलाओ।
युवा शक्ति हो बहकावे में मत आओ।।
उज्जवल कर लो जगा लो निज सौभाग को।
उठने मत दो जातिवाद के आग को।।

पंडित अनिल शर्मा ” जगमग”
सुबेदार / धार्मिक शिक्षक
भारतीय थल सेना

स्थायी पता
ग्राम व पत्रालय , पिंडी

अहमदनगर, महाराष्ट्र
8968361211

4. डॉ कुशल कटोच
१ आज धोलाधार
२. ऐ मन तू कब समझेगा

आज धोलाधार

सुनती थी

मेरी कबिताऐं

सफेद चादर

ओढ़ कर।।

मैं पढता था

कापते ठिठुरते

हाथों मे कागज लियें

कबिताऐं ।।

आज न सफेद चादर है

न बह ठिठुरन ।

बिन सिंगारी

धोलाधार

घूरती है मुझे।in

कहती

तुम ही हो

मुझे उजाडऩे बाले ।

न काटते पेड

न उगाते कंकरीट जंगल,

तो मैं भी ओढती

नई सफेद चुनरिया

चमकता मेरा बदन भी

सुनहरी किरणों से।

देखने आते

हजारों सैलानी।

हरे भरे रहते,

पूरा करती मैं

तुम्हारी जरूरत

का पानी भी ।

अभी भी है

समय

सम्भलने का

मेरे सजने का

सफेद चादर

ओढने का

सुन ले ऐ ईन्सान ।।

अब तुझे बदलना होगा।

डा. कुशल कटोच

लोअर वडोल दाडी

धर्मसाला

9418079700

ऐ मन तू कब समझेगा,

ऐक और जन्म निकल चला है।

पल पल गुजर रही। जिन्दगी,

यह पल भी तो निकल चला है ।

क्या कभी सोचा तूने,

कोन सा जन्म निकल चला है?

कुच्छ नहीं किया तूने जहां में,

यह जहां हाथ से निकल चला है

बचपन जबानी फिर बुढापा,

अब तो बुढापा भी निकल चला है।

कुछ कमा ऊपर ले जाना बाला भी,

बरना ये वक्त भी हाथ से निकल चला है।

रोज भूला भटकता है कहां,

रास्ता तो कहीं और निकल चला है

मन बुद्धि और आत्मा को साफ कर

बरना यह जन्म भी निकल चला है।

.डा. कुशल कटोच

लोअर बडोल दाडी

धर्मसाला( हि प)

9418079700

5. श्री विजय भरत दीक्षित
१. राम नाम दर्शन
२. पुकार

राम नाम दर्शन

सीताराम प्यारा है नाम,
नाम सुमिर ले भज मन राम।
चित्त प्रसन्न मिटेंगे संकट,
रघुपति राघव सीताराम।।

प्रभु भजन में ध्यान लगाएं,
गाओ रे जय सीताराम।
जो मांगेगे वह पाओगे,
मन भावन है पावन नाम।।

रोम रोम में रमते स्वामी,
सुंदर मधुर “भरत” के राम।
जानकी वल्लभ दशरथ नंदन,
नाम सहारा आठों याम।।

मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु जी,
आज्ञाकारी सीताराम।
मधुर मनोहर पावन सुंदर,
भज ले रे मन श्री भगवान।।

मनभावन हैं लोकलुभावन,
प्रभु का नाम भजो श्री राम।
मातुपितु भ्राता हैं रसिया,
रिश्ते उनसे श्रेष्ठ महान।।

श्री राम जय राम जय जय राम,
भगत ‘भरत’ भज सीता राम।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम,
श्री राम जय राम जय जय राम।।

स्वरचित अप्रकाशित
विजयी भरत दीक्षित
सुजानपुर टीहरा(हि.प्र।)
9625141903

पुकार

ठण्डी सांसें लेकर जब जब
मैंने तुम्हें पुकारा,
हिले अधर और बोल आ गए
हां यह गीत तुम्हारा।

नयन बंद थे सपना आया
सपने में तुम को पाया,
आंख खुली फिर मन घबराया
क्या खोया जो पाया।
कुदरत का अनमोल नज़ारा
क्यों नहीं साथ तुम्हारा।

आस पास तुम ही तुम हो
और नहीं है कोई,
आंखें बरस रही हैं जैसे
रिमझिम सावन होई।
नाम तुम्हारा प्यारा प्यारा
नाम ही एक सहारा ।

आ जाओ इक बार अगर तुम,
दे दो फिर से दर्शन
सर्वस्व तुम्हारे चरणों में है
तन मन धन सब अर्पण।
तन मन धन सब कुछ ही तुम्हारा
भक्त “भरत” है तुम्हारा।।

रचना —–
विजयी भरत दीक्षित
सुजानपुर टीहरा
( हि. प्र. )
9625142903

सम्पादक
आशीष बहल
शिक्षक
चुवाड़ी जिला चम्बा
सम्पादक भारत का खजाना

विकास ठाकुर ने ऊंचा किया देश का नाम

2 comments

  1. सभी रचनाकारों की रचनायें बहुत सुन्दर हैं सबको बधाई।

  2. काव्य महक के प्रकाशन हेतु सम्पादक आशीष बहल जी बधाई के पात्र हैं
    सुरेश भारद्वाज निराश

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