शहादत, बहादुरी की उत्कृष्ट परिभाषा है ‘कारगिल विजय’

भारत वीरों की भूमि है हम मुगलों, अंग्रेजो से लेकर चिरकाल भगवान राम तक के इतिहास को देखें तो अपनी मातृभूमि और अन्याय के खिलाफ भारतवासियों ने हमेशा अपनी जान की बाजी लगाई है और हर युद्ध मे अपने पराक्रम का लोहा मनाया है।हम में से बहुत लोगों ने आज़ादी के समय का क्रांतिकारी शौर्य भले ही न देखा हो परन्तु बहुत सी युवा पीढ़ी कारगिल को याद करती हुई बड़ी हुई है। भारत के वीर सैनिकों ने कारगिल युद्ध मे भी देश रक्षा का बीड़ा उठाया था तो आज चीन की हरकतों का भी मुँह तोड़ जवाब दे रहे हैं।

सैनिक सिर्फ सरहद की रक्षा ही नही करते ये एक ऐसी ढाल है जो दुश्मनों के आगे हिमालय बनकर खड़े रहते हैं ओर हम उन्ही के भरोसे अपने घर मे चैन से सोते हैं। और कई बार हमारी रक्षा करते हुए उन्हें शहादत मिलती है। शहीदों को याद करने का कोई खास समय नही होता पर कुछ दिन इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखे होते हैं उसी में से एक है, 26 जुलाई 1999 का वो दिन जब भारत ने कारगिल युद्ध पर विजयी हासिल की और दुश्मन देश पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। ये दिन विजयी दिवस के रूप में बदल गया। सही मायनों में ये हमारे वीर सैनिकों की ही विजय थी जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को गौरवान्वित किया। 60 दिन तक चलने वाले इस युद्ध मे भारत ने अंत मे विजयी पाई। इस आपरेशन का नाम “ऑपरेशन विजय” रखा गया था। 1971 के बाद ये बड़ा युद्ध था पहले तो पाकिस्तान इसे पूरी तरह नकारता रहा कि ये सैनिक युद्ध है वो इसे एक आतंकी युद्ध ही बनाने पर तुला रहा परन्तु भारत के वीर सैनिको ने अपनी बहादुरी से पाकिस्तान का काला चेहरा दुनिया के सामने ला दिया और पाकिस्तान को मजबूर होकर अपने सैनिकों और आतंकियों को पीछे हटा लिया। जो नही हटे उन्हें भारतीय सैनिकों ने खदेड़ दिया। युद्ध वैसे तो किसी भी प्रकार से हितकारी नही होता क्योंकि इससे जान माल का बहुत नुकसान भी होता है। और भारत के सीने में भी ऐसे जख्म कई बार मिले हैं। अब तक देश की रक्षा करते हुए कुल 1215 जवान शहीद हो चुके हैं। देश की आज़ादी से लेकर अब तक की बात करें तो 1962,1965 ,1971 और 1999 के युद्घ में हमें ये जख्म मिले हैं। 1999 के युद्ध मे 547 जवान शहीद हो गए थे। ये एक बहुत बड़ा जख्म भारत के दिल मे लगा था। देश पर शहीद होने वाला हर जवान अपनी मिट्टी का सच्चा रक्षक होता है। कैप्टन विक्रम बत्रा, सौरभ कालिया, और भी सैंकड़ो जवानों ने अपने प्राण भारत माँ पर न्योच्छावर कर दिए।
बस ये कहते हुए कि
“कर चले हम फिदा जान वतन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो”

देश की सेना में और शहादत में हिमाचल के जवान कभी पीछे नही रहे हैं। देश की आज़ादी से लेकर अब तक की बात करें तो 1962 के युद्ध में 131 हिमाचलियों ने शहादत का जाम पिया तो वंही 1965 में देवभूमि के 199 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। 1971 के युद्ध में भी हिमाचली वीरों का अमर देश प्रेम जिन्दा रहा और 195 वीर मातृभूमि पर कुर्बान हो गए। देश ने जब 1999 का कारगिल युद्ध लड़ा तो हिमाचल के वीरों ने वँहा भी अपनी वीरता का लोहा मनवाया। कई जवान वीरगति को प्राप्त हुए तो कईयों को सेना मैडल से नवाजा गया। ऐसा ही एक जिंदादिल हीरो शहीद परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा का “दिल मांगे मोर” का उदघोष आज भी युवाओं को प्रेरित करता है। बिक्रम बत्रा ने जिस बहादुरी के साथ टाइगर हिल को अपने कब्जे में लिया उससे दुश्मन पाकिस्तान का हौंसला टूट गया। राइफल मैन संजय कुमार को भी परमवीर चक्र से सम्मनित किया गया। देश की रक्षा में कारगिल युद्ध के समय जब देश ने विजयी मुकट धारण किया तो उसमें भी हिमाचली वीरों ने अपनी वीरता का लोहा मनवाया। कारगिल युद्ध में शहीद हुए 547 वीर जवानों में अकेले हिमाचल से ही 57 जवान थे जिन्होंने देश की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी। पहला सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र हिमाचल के ही मेजर सोमनाथ ने लेकर ये सिद्ध कर दिया था कि जब भी देश रक्षा की बात आयेगी पहाड़ी प्रदेश का गबरू अपनी जान की बाजी लगा देगा। शहीद होने वाले सैनिक अपना सर्वसव देश पर कुर्बान करके चले जाते हैं। और शहीदों की शहादत कभी बेकार न जाये इसके लिए आवश्यक है कि हम इनकी क़ुरबानी को हमेशा याद रखें। जब जब शहीदों का जिक्र होता है आतंक का काला सांप फन उठा कर आँखों के आगे आ जाता है। आतंक एक ऐसा जहर जो भारत को अंदर ही अंदर खोखला करने में लगा है परंतु देश के वीर सैनिकों के होते ऐसा संभव नहीं दीखता कि आतंकी अपने मनसूबों में कामयाब हो सकें। शहीदों की शहादत को मोल भारत वर्ष कभी चुकता नहीं कर सकता ये वो कर्ज है जिसे हम मात्र शहीदों के परिवार को सही हक़ दिला कर ही चुकता कर सकते हैं। परन्तु दिल उस समय बहुत दुःखी होता है जब ये सुनने को मिलता है कि शहीद के परिवार अपना हक लेने के लिए इधर उधर भटक रहे हैं। शहीदों ने जो देश के लिए किया है उसे करने के जो हिम्मत चाहिए वो सब के पास नहीं हो सकती। देश के शहीदों के नाम पर स्कूल कॉलेज ले नाम रखकर हम उन्हें सदा सदा के लिए याद रख सकते हैं। मेरा मानना है कि यही सबसे बेहतर तरीका है देश के शहीदों को सही सम्मान देने का जब वँहा के स्कूल और कॉलेज का नाम शहीदों के नाम पर रखा जाये। शहीदों के परिवार खुद को गौरवान्वित महसूस करेंगे और आने वाली पीढियां उनकी बहादुरी और देशभक्ति का अनुकरण करेंगी। अतः इस तरह की मांगों को सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए।

शहीद उस दीपक के समान है जिसने खुद को जला कर पूरे भारत को प्रकाशमय किया है। हम जो आज सुख की ज़िंदगी जी रहे हैं निर्भीक होकर अपने घरों में सोए हैं इसका कारण यही है कि सैनिक हिमालय के समान खड़े होकर – 50 ℃ पर भी हमारी रक्षा कर रहे हैं। वो गर्मी-सर्दी को भूल कर देश के प्रखर पहरी बने हैं। सब त्योहारों पर्वो की तिलांजलि दे कर सिर्फ देश सेवा को ही अपना धर्म मान कर दिन रात सरहद पर डटे हैं। जब गर्मी में हम ए सी की ठंडक ढूंढते हैं वो रेगिस्तान की तपती चादर ओढ़ कर देश के दुश्मनों के समक्ष खड़े रहते हैं। ऐसे सैनिकों के लिए बस इतना ही बहुत है कि हम हमेशा दिलों में उन्हें याद रखें उनकी क़ुरबानी को हमेशा याद करें।
अब आखिर प्रश्न उठता है कि कब तक अपने देश के जवानों को मरते हुए देखते रहेंगे। आतंक ने ऐसा तांडव मचाया है जिसका अब कोई स्थायी हल ढूंढना आवश्यक है। देश का हर नागरिक अब भारत की सरकार से पूछ रहा है कि क्या हम आज जब विकास की राह पर अग्रसर है डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया और भी कई विकास की बातें हम कर रहे हैं क्या कोई ऐसा प्रबन्ध नहीं किया जा सकता कि देश में इन आतंकियों को घुसने से रोका जा सके। अब समय आ गया है कि भारत और भी कड़े रुख को अपनाए पाकिस्तान को विश्व के सामने नंगा कर के उसे आतंकी देश घोषित कराये। आज हम सब देशवासियों को ये संकल्प लेना होगा कि हम देश के शहीदों को हमेशा याद रखेंगे उनके एहसान को हम कभी भुला नहीं सकते। जब जब शहीदों के परिवार को जरूरत हो हम हर दुःख सुख में इनका साथ दें। ऐसे वीर जवानों के लिए हर भारतवासी को हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए। आओ हम ऐसे सैनिकों का वंदन करते हैं और सबसे कहते हैं कि
“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले,
वतन पर मिटने वालो का यही आखिरी निशान होगा।”
जय हिंद

आशीष बहल
Jbt अध्यापक
चुवाड़ी जिला चम्बा
Ph 9736296410