बहुत खूब,
आरक्षण से डर रहे हैं सब,
जिसको मिला वोह भी ,
जिसे न मिला वोह भी,
फायदा हुआ न किसी को,
रंग चढ़ा हेरा फेरी की फर्द को।।

नफरत बढ़ी समुदाओं में,
फायदे की चाबी बनाई नेताओं ने,
राजनीति चमका रहे बैठे पद में,
क्युँ बाँट दिया इन्सान को इस कदर,
जब बाँटा नहीं है रव ने।।

आरक्षण के राक्षस ने ,
दुर्गंद फैलाई है सब में,
सौ बार सावुन मल कर देखा
जाने का नाम नहीं लेती है आज,
समाई ऐसी मानव की रग रग में।।

हो हल्ला हुआ कई बार,
आरक्षण घटा नहीं बढ़ा है,
बस रेल की सीट से लेकर देखिये,
राजनीति के पंच के पद में,
फंसता देखा है न्याय इसी छल में।।

जो करते हैं विरोध वोह बतायें,
किस आरक्षण को कहाँ से हटायें,
हर ओर आरक्षण मुंह खोल लेता है ,
कौन सा क्षेत्र बचा है अब,
आया न हो जो इसकी जद में।।

जिनको मिला है आरक्षण,
वोह भी न खुशी मनायें,
आरक्षित सीटों पर गैर आरक्षित को,
नौकरियाँ देते-करते हमने देखा है,
पढ़ा होगा यह भी आप सब ने।।

कुछ नहीं यह नेताओं का खेल है,
लड़ती रहे जनता यही मूल भेद है
तोड़ मरोड़ कर चेहतों को लाभ मिले,
नालायक को इंजीनियर डाक्टर बनाने का,
देश को खोखला करने का गन्दा खेल है।।
जग्गू नोरिया