कितने पुतले खाक हो गये/निशा कान्त द्विवेदी

विजयादशमी

कितने पुतले खाक हो गये
कितने रावण जला दिए
मन भीतर बैठा दसकंधर
नैतिक गुण संहार किए।
नव दुर्गा नव शक्ति समन्वित
नवरात्रों का उपवास किए
नित नूतन संकल्प समन्वित
पूजा पाठ विधान किए
गली गली औ चौराहों पर
आदि शक्ति सम्मान किए।
मन भीतर बैठा दसकंधर
नैतिक गुण संहार किए।
कितने ०……
सदियों से हम जला रहे हैं
पुतलों को चौराहों पर
अब तक क्या हम विजय पा सके
कुत्सित तुच्छ विचारों पर?
रावण छिपा विचारों में अब
क्या उस पर हम वार किए ?
मन भीतर बैठा दसकंधर
नैतिक गुण संहार किए ।
कितने ०…..
पूछे विजयादशमी तिथि भी
मानव क्या तुम समझ सके?
जिसे जलाना था वो बाहर
है या भीतर बूझ सके ?
जिसे जलाना था वो भीतर
है क्या इसे विचार किए ?
मन भीतर बैठा दसकंधर
नैतिक गुण संहार किए।
वक्त आ गया पुनः​ विचारें
अन्तर्तम का रावण मारें।
दंभ द्वेष पाखण्ड असत् की
सत्ता आज समूल संहारें ।
धर्म ध्वजा चहुंदिशि लहराए
आओ मन को राम बनाएं ।
मन भीतर बैठा दसकंधर
नैतिक गुण संहार किए
कितने पुतले खाक हो गये
कितने रावण जला दिए ।

—— निशा कान्त द्विवेदी

कितनी बार जला है रावण
हुआ दशहरा कितनी बार,
बढ़ी हुई संख्या रावण की
खुद को राम बनाओ यार।

कब तक और प्रतीक जलेंगे
खड़े सामने दुष्ट हंसेंगे ,
त्रेतायुग के रावण को तुम
कितने युग तक मारोगे ?
कलियुग में बहुसंख्यक रावण
खुद को राम बनाओ यार…
—— निशा कान्त द्विवेदी

आइए भीतर से राम होने का अनुभव करें…
विजयादशमी की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं सभी को।

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