कविता/ नंद किशोर परिमल

शीर्षक (कैसा होगा वह क्षण)
कैसा होगा वह क्षण, जब प्राण तन से निकलें।
मांगूं यही मैं भगवन्, तेरा नाम मुख से निकले।
सोचता रहूँ यही मैं, होगा कैसा वह इक क्षण?
मांगता हूं मैं तुम से, स्थिर रहे मेरा यह तब मन।
असली घड़ी वही है, जब प्रभु से होना है मिलन।
पहचान होगी वहीं सब की, रमा रहे उसी में तन मन।
क्या करोगे फिर तुम, यह दौलत और यह धन?
साथ कुछ भी न जाए, जब प्राण तन से निकलें।
ईश रहता सब के घट में, किसी से करो न खटपट।
फिर मिले न कोई किसी से, जब पखेरु तन से उड़ ले।
यह जग है सारा झूठा, नाम सच्चा है इक प्रभु का।
मन उसी में लगा तूं हरदम, ध्यान छोड़ दे और सब का।
फिर देख तूं तमाशा, प्रभु क्या कुछ नहीं है करता।
तूं सोच में पड़ा क्यों, फिर मौत से क्यों है डरता।
मौत से न डर तूं, प्रभु नाम जा तूं रटता।
जो नाम हरदम है रटता, काम उसका कभी न अटका।
प्रभु नाम सब से प्यारा, सारे है जग से न्यारा।
हरदम इस को रटे जा, यह अमृत सम है प्यारा।
अगली घड़ी है किसकी, कौन इस जग में जाने।
दो सांस में जान अटकी, पर कौन इस को मानें।
यह जग है सारा झूठा, नाम प्रभु का ही है इक सच्चा।
वही जग में है इक पक्का, बाकी सब कुछ यहां है कच्चा।
डोले न तेरा तब मन, जब प्राण तन से निकलें।
याद रखना यही तूं हरदम, प्रभु नाम इक है सच्चा।
मन टिकाए प्रभु में रखना, नाम जपते रहना हरदम।
कठिन फिर कुछ न होगा, मन शांत रखना तब तुम।
होगा कैसा वह क्षण, जब प्राण तन से निकलें।
मांगूं यही मैं हरदम, तेरा नाम मुख से निकले।
पीछे मुड़कर न देखना, लौ प्रभु से लगा तूं हरदम।
परिमल सोच न फिर तूं, प्राण प्रभु प्रेम में निकलें।।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358

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