कविता /दीपा कायथ

क्यों ये अधूरापन ,ये बैचेनी है तेरे बगैर …
यह कैसी तनहाई है
जो मुझे दूर कहीं तेरे ख्यालों में ले जाती है ,
वो दो पल की ख़ुशी तेरे मिलने की
हाय अभी तुझे ठीक से देखा भी नहीं
और तुम ना जाने कहाँ ओझल हो जाते हो …
फिर शुरू होता है कभी ना खत्म होने वाला इंतज़ार .. तेरी इक झलक पाने का इंतजार …
जानती हूं मैं तू कहीं नहीं है …
अपने ही बनाये भ्रमजाल में कितनी बेबस खड़ी हूं मैं या तू है?
हर समय दिल दिमाग में गुंजता यह प्रश्न
है क्या इसकी समाप्ति तेरे आने पर
या यही है मेरी नियति
अनंत कभी ना खत्म होने वाला इंतज़ार …
दीपा कायथ
आनी कुल्लू
हिमाचल प्रदेश

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