कविता / जग्गू नोरिया

कौन दिलायेगा चारा, कौन बनायेगा गौशाला,
दफतरों में कामचोर, करते रहते हैं घौटाला।।
नेताओं में खींचतान बड़ी, सत किसने खंगाला,
जनता मुंह देखती , माल खा रहे जीजा साला।।

गाड़ी खड़ी करने को जगह नहीं दफ्तर है आला,
समार्ट सिटी बनेगी कैसे समार्ट है जो धर्मशाला।।

सरकारी नौकरी मतलव रिश्वत की पहनी माला,
टुकड़ा न फैंको जवतक, काम न होगा आला।।

आखिर कौन होगा

सब सोये पड़े ,कोई नहीं दिखता जगानेवाला,
जो करे हिम्मत कहते कौन है समझाने वाला।।

रख रहा है अवाम दफ्तर दफ्तर का हवाला,
जल्दी ही रोशन करेगा जागरुकता की ज्वाला।।
जग्गू नोरिया
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