।। कब तक होते रहेंगे ।।
याद नहीं वो पल वो घड़ियाँ,
प्रताड़ित न होती हो कहीं लड़कियाँ,
कोई स्थान जगह नहीं है बची,
सुरक्षित महसूस कर हो खड़ी हक से,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?
मार दी जाती है कभी गर्भ में,
शायद बाद के हसर के डर से,
मालूम नहीं क्या होगा साथ उसके,
घवराहट भरे कदम निकलते घर से,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

चार दरिन्दे फव्तियाँ कसते,
लोग तमाशदीन का किरदार करते,
बहशियों की टोलियाँ बढ गई,
हिफाजत चाटता दीमक कब से,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

विकास की बातें हाँकने बालो,
कुछ तो तुम ही शर्म लिहाज करो,
विकास में दरिन्दे ही देख बढ़ रहें,
अपराध कर रहे बढचढ कर एक एक वे,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

जिन हाथों में सुरक्षा की डोर है,
वोह हाथ बहुत ही कमजोर हैं,
देश को लूटने की मची होड है,
सत्य क्या ?कहना एक मत से,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

चोर उचक्के बढ़ते बढने दो,
नशेड़ियों को नशों में मरने दो,
जुर्म गुडिया पर करे न कोई,
मिटाना है अपराध विवेक और वल से,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

जाग जाओ बहन के भाई,
कसम राखी की बंधी कलाई,
देख कैसे दरिन्दों ने लाडली मार मुकाई,
करने होंगे वार तुझे सीधे खड़ग के,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

कहती है सरकार कानून हाथ न लो,
मानवाधिकार अब तुम कहाँ हो,
मत खड़ना दरिन्दों संग अब की बार,
तेरी वजह से बाहर हुये दरिन्दे हद से,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

हाथों में मोमबत्तियाँ ले मत चलना,
यह गुडिया के साथ अन्याय होगा,
सजा दो दरिन्दों को खुले चौराहे पर,
बहशीपन मिटाने का उपाय है हट के,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

हे कानून के विद् विद्वानो जरा बताना,
क्या सही है इन दरिन्दों पर केस चलाना,
यह कोई न्यायिक गुनाह नहीं हुआ है,
हुई है दरिन्दगी ऐसी रो रहे सब फवक के,
कब तक जुर्म सहेंगीे गुडिया पूछता हूँ सबसे?

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