मिटना चाहता हूँ मैं
इस तरह गुनाहों से लड़ते हुये।
जिस तरह मिट जाती है
नदिया की धारा
सूखे गलों की प्यास बुझाते हुये।।
न जाने क्युँ डरते हैं लोग
ऩ्याय की बात कहने से ,
कौन सा रिश्ता टूट जायेगा
मात्र आवाज उठाने से।।

क्युँ बुझदिल बन कर तैयार बैठे
अपना ही गला कटवाने को,
सब जानते हुये भी
इन्तजार रहता है
आये कोई बही बात समझाने को।।

खून के रिश्ते
जहर उगल रहे हैं हर तरफ,
गैरों के तलवे चाट कर कहते,
कोई[अपना] आये न आये,
पड़ता नहीं कोई फर्क,
ऐसी जब हो गई सोच,
वेकार लग रहे देना तर्क।।

Sent from BharatKaKhajana