सत्ता के अजीव पैंतरे हैं,
चन्द लोग लेते फैसले,
प्रभावित होते लाख सैंकड़े हैं।।
चारदीवारी में नीतियाँ बनती,
हाल मन्दे कारगुजारी से,
मन्दिर में देवी कब आयेगी,
हिम्मत नहीं पूछ लें पुजारी से।।

पगार पाऊँ सरकारी स्कूल में ,
फीस चुकाऊँ जा नीजि स्कूल में,
किस से पुछूँ जा कर मित्रो,
जी रहा शिक्षक क्युँ भूल में।।

मॉल जाकर कपड़ा खरीदूँ,
रखूँ चेहरा दिखावे की तस्वीर में,
पड़ोसी से नीचे कुछ नहीं मंजूर,
जी रहा क्युँ मानव ऐसी ठीस में।।

जगह जगह सजे भण्डारे,
घर पर प्यासे माँ बाप वेचारे,
कैसा सेवा भाव होगा दोस्तो,
हासिल होगा क्या बैठ सोच लो।।
जग्गू नोरिया