कविता
~गर्द~
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‘एक तो उम्र भर की थकान ;
दूसरा, अपनों की अवहेलना का दर्द ….|
बुढ़ापा है ही कोई, ऐसी गर्द ;
जिसमें लिपटता है हरेक,
औरत या मर्द….||
टी सी सावन