कविता

आज आदमी आदमी नहीं रहा,
आदमी को आदमी बनाना है।
सीधे रस्ते कोई नहीं चलता,
आदमी को रास्ता दिखाना है

अब तुम क्या करोगे
कितनी बार मरोगे
हरबार तुम्हें यही समझाना है
आदमी को आदमी वनाना है।

पहले तू आदमी हो जा,
इन्सान वन इन्सानियत में खो जा,
तुझे इन्सानियत को अपनाना है,
आदमी को आदमी बनाना है।

दिल टूटा जान न निकली,
हाथों से किस्मत फिसली,
यह दु:ख किसे सुनाना है,
आदमी को आदमी बनाना है।

मरना आसान नहीं,
जीना पहचान नहीं,
जिंदगी जिंदगी नहीं झुठलाना है,
आदमी को आदमी बनाना है।

जख्म नासूर हो गये,
अपने दूर हो गये,
अकेले कहां ठिकाना है,
आदमी को आदमी बनाना है।

दिल में कितना दर्द है,
बेजान जिस्म सर्द है,
मौत सच्ची जीना तो वहाना है
आदमी को आदमी बनाना है।

तुम सक्षम हो कुछ भी करो,
समन्दर को अंजलि में भरो,
तुम्हें लफ्जों से इतिहास चुराना है,
आदमी को आदमी वनाना है।

कल़म चाहिये हथियार नहीं,
सहित्य चाहिये बाज़ार नहीं,
निराश कल़म से लगाना निशाना है,
आदमी को आदमी वनाना है।

*सुरेश भारद्वाज निराश* ?
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