कविता/राम भगत नेगी

तारे भी दिखते है …
तारे भी दिखते है जब
खुली आसमां के नीचे जब हम बेठते है

रात गहरी सुनसान ऊपर नीला आसमां
हवा मंद मंद सुनसान घटा घनघोर

अपनों का ना शोर ना नाचे रात को मोर
जंगल सुन शान राम भगत परेशान

समाज में भीड़ भीड़ मे हम अकेले
ना मौत ना जिंदगी बस मजबूर

दुर सिर्फ रोशनी रोशनी में तन्हाई
कोई नहीं सुनता यहाँ दिल की पुकार

बस चारों और सुनसान रात
और ऊपर बस तारे

अनगिनत बस्ती वहां
ना अपनों के लिये रोना ना हँसना

बस हमें देख रोज़ टीम टिमाना
और हमारी खुशियों के लिये टूट जाना

तारे भी दिखते जब ….
राम भगत

Sent from BharatKaKhajana

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *