कविता/बी पी ठाकुर

सिसकते रिशते
Message Body:
बाजार में,
मेलों में,
प्रेम पुष्प गुलाब ,
बिकते दिखे,
बहुत सारे ,
खरीददार दिखे,
फिर भी रिशते ,
सिसकते दिखे ,
ढलते सूरज के समय मां बाप,
अकेले जीते दिखे,
जमाने की होड़ में अपने अपनों को,
छोड़ते दिखे,
रिशते सिसकते दिखे,
शायद खरीददारों ने अपनापन बेच ,
गुलाब खरीदे।

बी पी ठाकुर

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