शीर्षक (मौत से था सामना, भूला सब ज्ञान – आन-शान और बान)
मौत से था सामना, भूला सब ज्ञान – आन-शान और बान।
जंगल की ओर जा कर बनाया था, मैं ने एक आलीशान मकान।
था बड़ा सुंदर, बहुत बड़ा, गगन चुम्बी खूबसूरत वह मकान।
दरवाजे और खिड़कियां, बड़ी बड़ी, आकर्षित करतीं सबको अपनी ओर।
देख कर था मन प्रसन्न, सोचता था मैं अब हो गया कितना बड़ा।
इस सोच में था पड़ा, परिमल वाह! क्या बात है तूं अब हो गया कितना बड़ा!
ख्याल आते दुनिया के, मैं कितना महान, बलवान और यह आलीशान मकान।
कोई बड़ा नहीं होगा मुझसे, और इस सारे जहान में, मैं हूं बड़ा महान।
यह क्या! देखते ही देखते, इक मृग शावक आ गया, सामने था वह खड़ा।
आंखों में आंखें डाल, देखता था मुझे जो बना था अब तक सब से बड़ा।
पूछता था – तूं अरे महान है, कितना ज्ञान वान है, तेरा यह आलीशान मकान है कितना बड़ा।
काफूर हुए सपने सारे, विचारधारा के सभी सपने, ज्ञान था जो पड़ा, अब न जाने कहां गया।
चित्त के विचार सब और कुदरत के नजारे, न जाने कहाँ गायब हुए सब।
मौत से था आमना और सामना, था शावक के संग आन पडा़।
इसके आगे न ज्ञान चलता न किसी की शान चलती, जब मौत से हो आमना और सामना।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358
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