कविता/डॉ मीना कुमारी

युग सृजन की नव कड़ी को जोड़ती मैं,
रूढ़ियों की श्रृंखला को तोड़ती मैं।
रश्मियों को मैं सदा आहूत करती,
रुख हवाओं का प्रभंजन मोड़ती मैं।।
दीप को देकर सहारा दीप्त करती,
मैं सदा नव मल्लिका में ओज भरती।
आँधियाँ तूफान मेरे हमसफर,
काल हों कितने कराल मैं न डरती।।

हम अनल में पाँव रख़कर चल चुके,
अहं मेरे सब उसी में जल चुके।
कंटकों की बात अब हम क्यों करें,
हम अडिग हैं प्रबल पथ सँभल चुके।।

Dr meena kaushal

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