कविता/डॉ कंवर करतार

कविता / अधीर वो पिया मिलन को
शिखरों से प्रताप दिखाती
प्रपात में झरझराती
पर्वतों को काट काट कर
अबरोधों को तार तार कर
जल धारा प्रलय मचाती
जब गिरती और गिराती
लवलीन हो या उन्मांद में चाहे
सण सणाहट भरी अज्ञेय गानधुन से
गाती गाती- बहती जाती
नियति तो उसकी बहना है
विलीन होने तक
बस चलते- बगते रहना है
हो अधीर वो पिया मिलन को
बुझाए कैसे निज जल से
विरह ग्रसित हिय – जलन को
छोटे बड़े सब नद नालों के
जल को समेटे अपने में
आतुरता से बढ़ती जाती
देकर खुद को नव जीवन
मैले कुचैले तटबंधों को
खुरच खुरच कर धोती जाती
तपती प्यासी धरती की
वो प्यास बुझाती जाती
फल फूलते तरुवर और
लहलाती फसलों का कर नव सृजन
जन जन को देती जाती
मानव को अग्रसर कर
विकास पथ पर
निज नियंता की ओर
बढ़ती जाती – बढ़ती जाती
दिखे जब उसका हृदय विशाल
फलक को छूता और
उसे समाने को तत्पर
आकुलता तब ढरती जाती
फिर कर देती सम्पूर्ण समर्पण
अविकल समतल प्रशांत में
निज अस्तित्व को खोकर
महाप्राण में विश्रान्त होकर I
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