आज समस्त समाज की यही कहानी है,विद्वानो।।
नौकर से साहूकार तक,
आँगन से बाजार तक,
चपरासी से सरकार तक,
खेत से व्यापार तक,
संस्कार से व्यबहार तक,
कश्मीर से बिहार तक,
सवाल से जवाब तक,
आसमान से पाताल तक,
मण्डप से पण्डाल तक,
हालत से हालात तक
बेटे से बाप तक,
पुण्य से पाप तक,
वरदान से श्राप तक,
शीतल से ताप तक,
कोयले से आग तक,
झूठ ही झूठ बोला जा रहा,
घर से चलते शमशान तक,
मैं अनपढ़ लिख रहा हूँ झूठ,
सुवह से शाम तक,
पकाता रहा बिन आग ,
खिचड़ी आजतक।
लिख दिया झूठ सब,
देख लो सीना तानकर ।। नमन जी