जिसका जहाँ मन करता,
कुड़ा करकट बहीं गिरता,
भर दिये नाले कचरा कचरा,
कौन कहाँ फिकर है करता।।
जितना आज स्वच्छता का,
प्रचार है,
उतना ही माड़ा हुआ हाल है,
फोटो खिंचबाने तक हाथ झाडू,
फैंकता कौन कहाँ है फिरता,
कौन कहाँ फिकर है करता।।

दफ्तरों के अगवाड़े देखो,
गट्टर से भरे पिछवाड़े देखो,
देख मन पीडा से दुखता,
झूठ का कटोरा देख यहाँ विकता,
कौन कहाँ फिकर है करता।।

दफ्तर समय दस बजे का,
ग्यारह तक बस नहीं चढ़ता,
कैसे काम करवायेंगे लोग,
वोह तो मन्त्री का खास है चमचा,
कौन कहाँ फिकर है करता।।

यह हाल हैं सरकारी द्वार के,
मत जाना कोई उम्मीद पाल के,
योजनायें तो मात्र दिखावा है,
घूस बगैहर नहीं कोई काम बनता,
कौन कहाँ फिकर है करता।।

सब के सब आदि हो गये हैं,
बाबुओं के भाव जान गये हैं,
चुकाता मोल काम हो जाता है,
जग्गू बैठा दफ्तर देखता ही रहता,
कौन कहाँ फिकर है करता।।

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