कविता
अबला चीखें दब कर रह जाएंगी हाहाकारों में !
जब तक भीष्म मौन रहेगा बेगैरत दरबारों में !
उसको बूढ़े मात-पिता के आंसू कहाँ दिखाई देंगे !
तन -मन जिसने झोंक दिया हो पायल की झंकारों में!
उसके हाथों ने तो आखिर जख्म रसीदा होना था !
फर्क नहीं जो कर पाता हो फूलों में और खारों में !
पांच वर्ष अब होने को हैं पागल फिर से नाचेंगे !
डूब डूब कर मस्ती में सब लोक लुभावन नारों में !
इक दिन आएगा जब मिटटी ,मिटटी में मिल जाएगी !
बेशक मुझको ढूंढोगे तुम सूरज चाँद सितारों में !
एक हवा का झोंका ठन्डे चूल्हों को अब काफी है !
एक चिंगारी बची हुई है बुझे हुए अंगारों में !
अब के इस बस्ती में बचना नामुमकिन है मेरे यारो !
एक अनोखी जंग छिड़ी है बस्ती के सरदारों में !
जगजीत आज़ाद
आज़ाद निवास बलेरा,तहसील डलहौज़ी ,जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश …….176301