कविता/जगजीत आज़ाद

कविता
थर – थर जनता कांप रही है भ्रष्टाचारी तंत्र से !
अब कैसी उम्मीद लगाएं इस बहरे गणतंत्र से !
बेबस लाचारों की सुनता यहाँ कोई आवाज़ नहीं !
सवा लाख से एक लड़ाने वाला कोई बाज नहीं !
चोर सिपाही मिलकर आंख मिचोली खेला करते हैं!
बेकसूर हैं जो भी ो तो ंसिफ से भी डरते हैं !
ऊब चुकी है जनता अब तो लोकलुभावन नारों से !
बिन पैंदे के लौटे सी इन मिली जुली सरकारों से!
मासूमों की बलि है लगती रोज यहाँ अब दंगों में !
लिपट के फौजी आते हैं यहाँ रोज नए तिरंगों में !
सत्ता के शिखरों पर बैठे लोगो अंतर्मन खंगालो !
लहुलूहान है भारत माता जख्मी है इसको सम्भालो !
देर न करना वक्त को समझो चिंगारी उठ जाएगी !
लाल लहू की नदियां होंगी धरती फिर से नहाएगी !
शहीदों ने जो देखा था वो ख्वाब अभी अधूरा है !
क्रांति अभी अधूरी है अभी इंकलाब अधूरा है !
अखवारों में बढ़ चढ़ कर तुम चाहे कितनी शान दिखाओ !
सत्ताधीशो झुग्गी झोंपड़ पर भी कुछ प्रकाश फैलाओ!
वरना हर एक साल ये देश गणतंत्र दिवस मनाएगा!
इक मज़दूर का बच्चा लेकिन भूखा ही सो जाएगा !
हर भूखे के पेट में रोटी तन पर कपड़ा आएगा !
बच्चा बच्चा सच में तब गणतंत्र दिवस मनाएगा !
जो कुछ देखा जो कुछ समझा कविता तक पहुँचाया है!
गणतंत्र का असली मतलब मेरी समझ न आया है !
थर-थर जनता जब तक कांपेगी इस झूठे तंत्र से !
मुझे कोई उम्मीद न लगती तब तक इस गणतंत्र से !
जगजीत आज़ाद ,आज़ाद निवास बलेरा ,तहसील डलहौज़ी जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश -176301
मोबाइल -9418007729

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