मैत्री बांछित है🛎
गगनचुंबी भवन,
विकास के गीत गाते हैं।
कम होते जंगल,
विनाश की आहट सुनाते हैं।
उत्पादकता को बढ़ाते कारखाने,
समृद्धि का संदेशा हैं।
चिमनियों से निकलता धुआं,
व्याधियों का अंदेशा है।
गलेशियर पिघल रहे हैं,
इन्सानी बस्तियों को निगल रहे हैं।
भूस्खलन से पथ अवरुद्ध हैं।
लक्षण प्रगति के विरुद्ध हैं।
ओजोन परत खंडित हो रही है।
भूचालों से धरा दंडित हो रही हैं।
अस्वच्छता से परिवेश लांच्छित है।
पर्यावरण से मैत्री बांच्छित है।

गोपाल शर्मा,
जय मार्कीट ,
काँगड़ा हि.प्र.