कला
कला होती मुझमें कोई,
सज्जनों से घिरा रहता ,
दुर्जन होता न कोई ,
जरूरत नहीं होती किसी अंगरक्षक की,
सहज मिल पाता हर कोई,।I
अभिमान न होता किसी औहदे का,
आस्तित्व जान लेता किसी पौध का,
कुचलने को मशगूल जिसे हर कोई।

बूंद बन वहाँ गिरता
मुंह खोले जहाँ होती
सिप्पी कोई,
सब के खजानों से मोतियों से भर देता,
गर सिखा देता ऐसी कला कोई।।

यहाँ तो लकीर के फकीर हैं,
खाल बचा कर लिखता हर कोई,
वोह अम्मा घर से बाहर कर दी,
हाथ जिसके न रही ढ़ोई।।

समझ जिसको भी नहीं है,
वोह भी कहता उससे लो समझोई
कैसी रीत बना दी भगवन तुने,
पिलाती नहीं दूध माँ भी,
सन्तान जब तक न रोई।।

जग्गू नोरिया