औरत/दिव्या बदली

दिव्या ‘बदली’ ( Mrs.Sawan) की कविता —-
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~ औरत का घर ~
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‘कहने को, दो घर की मालकिन,,,
औरत मेरा, नाम है |
मायका हो या ससुराल ;
कहीं न मेरा, धाम है ||

पिता के घर, जब हुई मैं पैदा ;
कहते धन पराया है ….|
भैया को देख, इतराते ;
कहते, असली वारिस आया है …||

गई जब ससुराल, तो कहते ;
देखो बहू आई है …|
यहाँ तो सबकुछ बेटे का है ;
देखें, ,, संग क्या लाई है !

जहाँ मैं, रहती-बसती हूँ ;
कुछ नहीं है मेरा वहाँ पर |
है कोई ऐसा जो बतलाए ,,
कहाँ है मेरा असली घर ??

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