कोरोना महामारी के इस दौर में पूरे विश्व के कदमों में बेड़ियाँ सी पड़ गयी हैं और बहुत से कार्यों की गति थम सी गयी है इसी दौर में अगर हम हिंदी साहित्य और साहित्य रचना की बात करें तो इसमें एक अलग ही मुकाम हमें देखने को मिल रहा है। हिंदी साहित्य और साहित्य रचना की कोई सीमा नही है और न ही इसे किसी शब्दों में बांधा जा सकता है और मैं भी ये अपराध नही कर सकता। हिंदी दिवस के अवसर पर हम अक्सर देखते हैं कि भाषा संस्कृति विभाग चाहे वो किसी भी राज्य के हों हिंदी दिवस को बहुत ही सफल तरीके से आयोजित करते हैं। हिंदी दिवस का अभिप्राय ये कभी नही है कि हम मात्र एक दिन हिंदी को समर्पित कर रहे हैं। कुछ लोग इस तरह की बात कहते हैं कि हिंदी किसी विशेष दिन की मोहताज़ नही तो मै उन लोगों को बताना चाहता हूं कि किसी दिन को मनाना उसके प्रति हीन भावना कदापि नही है। जैसे हम अपना जन्मदिन मनाते हैं, हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, हम शादी की वर्षगांठ मनाते हैं इसी तरह हिंदी दिवस भी हमारी हिंदी का पर्व है। 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर जिला मुख्यालयों में कई आयोजन किए जाते रहे हैं। तो इस वर्ष ये संभव नही कि इन आयोजनों को सामुहिक रूप से किया जाए ऐसे में भाषा संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश के द्वारा ऑनलाइन ही इन कार्यक्रमों को बहुत अच्छे ढंग से आयोजित किया जा रहा है। अभी हाल ही में प्रदेश स्तरीय युवा कवि सम्मेलन का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो कि भाषा संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश द्वारा ऑनलाइन आयोजित किया गया। इस कवि सम्मेलन में इस बात का आभास हुआ कि भले ही कोविड के इस दौर में सामूहिक रूप से हम गोष्ठी नही कर सकते परन्तु सृजन कभी रुकता नही है। ऐसे ही भाषा संस्कृति विभाग चम्बा के जिला भाषा अधिकारी महोदय श्री तुकेश शर्मा जी के द्वारा भी बहुत सुंदर कार्य करते हुए कई नई प्रतिभाओं को ऑनलाइन कवि सम्मेलन में जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। ये अपने आप में एक सुखद अनुभव है। भविष्य में इसके बेहतर परिणाम देखने को मिलेंगे।
इस लोकडौन के दौरान तो ऐसी कई प्रतिभाएँ उभर कर सामने आई हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा से अचंभित किया है फिर चाहे वो नृत्य हो, गायन हो, अभिनय हो या फिर कविताएँ हों हर किसी ने अपने अंदर के हुनर को बहुत खूबसूरती के साथ सोशल मीडिया का प्रयोग करते हुए लोगों के सामने रखा है। कई ऐसे कवियों के क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो जाते हैं जिन्हें देखकर और सुनकर असीम संतुष्टि होती है। शायद इन कवियों को हम इनकी किताबों में कभी न पढ़ते। हिंदी साहित्य का सृजन तो चिरकाल से होता आया है परम् आदरणीय मुंशी प्रेम चंद जी, निराला जी, महादेवी वर्मा जी अनगिनत कवियों और साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य की अविरल धारा को भारत के कण कण में उतारा है। आजकल कई युवा कवि अपनी कला का परिचय दे रहे हैं। सृजन कई भाषाओं में होता है और जो भी सृजन होता है वो साहित्य के प्राण होते है ये कदापि रुकना नही चाहिए। हमने वो दौर भी जिया है हम ये दौर भी जी रहे हैं।इस समय बच्चें अपनी किताबों से दूर हो गए हैं ऐसे में साहित्य को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पंहुचाने का ये एक बेहतर अवसर है। हमें हर बच्चे को कवि नही बनाना और हर बच्चे को साहित्यकार नही बनाना परन्तु उनकी रुचि को पहचानने में कोई बुराई भी नही। यदि बच्चे में प्रतिभा है तो उसकी प्रतिभा को सराहा भी जा सकता है और उसे मंच भी दिया जा सकता है। ऑनलाइन का जमाना है और बच्चे इस जमाने के साथ चलना पसन्द करेंगे। हाँ थोड़ा सा मलाल जरूर रहता है कि बहुत से बरिष्ठ कवि जो नवोदित कवियों के मार्गदर्शक बनकर साहित्य बुनना सिखाते थे वो इस दौड़ में पिछड़ रहे हैं। परन्तु इस खाई को भी तभी पाटा जा सकता है जब आज का युवा कवि वरिष्ठ कवि को इस ऑनलाइन धारा से जोड़े और बदले में उनसे साहित्यिक मार्गदर्शन प्राप्त करे। व्यक्ति चला जाता है समय बीत जाता है परन्तु लिखा हुआ वर्तमान से लेकर भविष्य को भी राह दिखाता है। इसलिए कहा भी है कि ज़िंदगी में आए हैं तो पढ़ने लायक कुछ लिख जाओ या लिखने लायक कुछ कर जाओ।
आशीष बहल
शिक्षक, लेखक एवं कवि
चम्बा हिमाचल प्रदेश
9736296410